Wednesday, February 8, 2012

"कुछ चुभता हुआ सा..."




हाल ही में मैंने German निर्देशक Fassbinder की फिल्म "Ali fear eats the soul" देखी| डर, किसी जासूस या गुप्त राज़ की तरह मनुष्य के जीवन में प्रवेश कर उसके मन को नोचता रहता है, जीस प्रकार गीध मांस के टुकड़े को नोच-नोच कर खाते है|धीरे धीरे मानसिक, शारीरिक और भावात्मक क्षमताएँ कम करता हुआ वो किसी फाँस की तरह हर दिन चुभता सा रहता है| मुझे इस डर से बहुत भय लगता है, शायद उन चूहों से भी ज्यादा जो मेरे घर में खाने की वस्तुओं या पुराने furniture की लकड़ी को कुतरते रहते हैं| यह चूहे मेरी नींद, मेरे मन की शांति पे धावा नहीं बोलते, इसलिए इन्हें बाइज्ज़त बरी कर दिया है मैंने, पर यह डर, मुझे खोखला सा करता हुआ, मेरे नींद से सपने खरोंचता हुआ, बना दिया है मुझे जिसने पिंजर, इसे कैसे अपने से दूर करूँ?डर मुझ तक सिमित रहे तो शायद संभाल लूँ पर यह मेरी नंसों में से सरकता हुआ मेरे रिश्तों, मेरे काम, मेरे हाव-भाव में मिल गया है, अब इससे बचने का उपाय नही सूझ रहा मुझे| कभी असफलता, कभी आशाभंग बनके मेरे जीवन को मृत्यु की दिशा में ले जा रहा है| और मृत्यु का डर तो सबसे परम है, इससे इजाद पा लिया तो ज़िन्दगी ओस की बूंदों जैसी ताज़ी और सुन्दर हो जाये..शायद|


डर को निकालने के लिए उसकी जड़ तक पहुचना ज़रूरी है, कैसे और कहाँ से आता है यह डर?क्या समाज डर उत्पन करता है, पर हम सब से ही तो यह समाज बना है, परन्तु फिर भी हम डर को नहीं मार पाते|समाज में स्वीकृति पाने के बाद भी कहीं कुछ फाँस जैसा दिल में चुभता , यह था डर, वो ही डर जो समाज ने मन में पैदा किया| पर समाज नहीं तो डर नहीं?, काश ऐसा कहना आसान होता, परन्तु डर जीवन-मृत्यु की चक्र के साथ रोम-रोम में किसी बिन बुलाये मेहमान की तरह घर करे बैठ जाता है...तो डर का बीज, सिचाई और उपज इन्सान के मन की ही देन हुई, इसलिए आज कल महसूस होता है कुछ "चुभता हुआ सा..."|


"डर हैवान सा खराश करता हुआ 

जिंदा रखे मेरी रूह को ...|"

Monday, February 6, 2012

रात...

कोहरे में कंपकपाती रात, दस्तक देती मेरे दरवाज़े पे रात,

चाँद से मुह फेर अपने ही कालेपन के श्रृंगार से सुशोभित,

एक लोटा चांदनी के बदले सियाह्पन का राज़ खोलने आई

यह रात कहीं बिछड़ गयी थी अपने तारों की छावनी से,

टूटते तारे के इंतज़ार में तमन्नाओं की गठरी लिए बेठी थी|


मैंने कहा तू क्या करेगी अपनी हद का फल्सबा मुझे सुनाके

आखों में पड़ी किरकिरी के साथ उसे भी सुबह भूल जाउंगी,

अँधेरे पे गर्व करती रहस्मय ढंग से मुझ पे हंसी वो कमीनी

और बोली "लाल है मेरा चाँद निहत्था खड़ा काले धुंए में"

कोहरे में कंपकपाती रात दस्तक देती मेरे दरवाज़े पे रात|










Tuesday, January 31, 2012

नन्ही स्त्रियों की रहस्मय कामुकता(sexuality)...reading Lolita...


क्या हम नन्ही स्त्री की कामुकता का अनुमान साधारण व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और भावप्रधान तत्वों के अनुसार लगा सकते हैं?नन्ही कोमल स्त्रियों के लिए sexual desires जैसे शब्द पुरे महत्व और संजीदगी के साथ कहे जा सकते हैं?क्या लोगों का और इन तितलियों का अवलोकन इन शब्दों के प्रति एक सामान गलती से भी होता होगा?स्त्री जाती में hormonal growth कुछ 12-13 वर्ष की आयु से आरम्भ हो  जाती हैं, जब उन्हें उनके गुप्ताँग और उनसे जुड़े स्पर्शज्ञान का एहसास होता है| इसी समय वो एक बालिका और स्त्री के बीच के मझदार में अपने आप को फंसा और शायद निहत्था महसूस करती होगी| सोचने की बात यह है की इस नन्ही स्त्री के मन में आकर्षण किस प्रकार का उत्पन्न होता है? क्या उस डर और झिझक के भीतर दबी हुई राइ के दानों जैसी शारीरिक ज़रूरतें अपनी चरण सीमा तक पहुँच पाती होंगी?इसी पेचीदा सवाल का जवाब ढूंढ़ते हुए वो teenage के मध्यम स्तर तक पहुँच जाती है जो की 15-17 वर्ष की आयु होती है| इस समय उसके मन का संकोच और शारीर का बेढोल रहना भी कम होने लगता है, इसका सबसे उप्रयुक्त और सहमत उत्तर hormonal changes की गतिविदियों में स्थिरता आना है|यह बात की शायद वो अपनी शारीरिक ज़रूरत को धीरे धीरे समझ रही है किसी सभ्य व्यक्ति के सोच से बहार क्यूँ है? उसका नीरस बेरंग सा रहना या बगावत करना शायद उसकी यौन इच्छाओं से उत्पन हुआ भावात्मक विस्फोट होगा|उससे उम्र और कद में ज्यादा सयाने लोग उसकी इस प्रकार की नाजायज़ सी ज़रूरत को शायद उसका बचपना समझ कर टाल देते हैं या फिर डांट फटकार मारकर उसे स्वयं अपनी ही कामुकता के भंवर में गोते लगाती हुई छोड़ देते हैं|मासूमियत का धागा चंचलता के मोतियों में से गुज़रते हुए उसे पूरी स्त्री में कब परिवर्तित कर देता है उसे वो और उसके आस-पास के लोग भी नहीं समझ पाते| प्रेम और वासना के बीच खिंची रेखा का तात्पर्य हर स्त्री के नज़रिए से उसके teenage के अनुसार भिन्न भिन्न कल्पना शक्ति में परिवर्तित हो जाता है|अंत में प्रशन यह उठता है की क्या वो नवजात स्त्री, शारीरिक और मानसिक दोनों सन्दर्भ में, अपने यौन सम्बंधित जूनून को सही ढंग से समझ पाती है या नहीं?...

Sunday, January 29, 2012

शोक...






मैं नहीं जानती की शोक के समय सहानुभूति के कौन से शब्द पीड़ित को बोले जाते हैं,यह इसलिए नहीं की मेरा यह मानना है की आत्मा मृत्युंजय है और कुछ समय बाद उस गुज़रे हुए व्यक्ति का पुनः किसी अन्य रूप में आगमन होगा,परन्तु सत्य यह है की मैं शोक सभा में प्रस्तुत जनों की दुख़ की सीमा को भांप नहीं पाती,यदि कोशिश करती हूँ तो मन में सवाल उठता है की जब उनका उस मृत व्यक्ति के जीवन में पहला दिन हुआ होगा तो उन दोनों की मानसिक और शारीरिक स्तिथि कैसी होगी? 


क्या अपने प्रेम और हर्ष की सीमा को वो लाँघ पाए होंगे या फिर उनका रिश्ता समय और संसार की बढती गतिविदियों के साथ कुछ धुंधला सा हो गया होगा?ऐसी किसी बेढंगी सी सोच में पड़ कर मैं उस शोक ग्रस्त व्यक्ति के अंतर्मन को टटोलने की कोशिश न करके उस पल एकाएक जो शब्द मुह से निकलते उन्हें ही उप्रीत समझ अपनी प्रस्तुति का सबूत जैसी उसे दे देती|उस मृत सफ़ेद चद्दर में लिपटे इन्सान के भावों का एहसास मुझे ज्ञात नहीं हो सकता,शायद होता तो कोशिश करती की बाकियों जैसी मेरी आँखें भी नम हो जाएँ|तब तक मृत्यु के समय भावों के एहसास को मुझे समझने की शायद ज़रूरत नहीं या फिर किसी करीबी के गुज़र जाने का इंतज़ार करूँ|



Tuesday, January 24, 2012

दाह-संस्कार





झंकार उठती है समय के गुमशुदा अंतराल में,
जगाता कोई अपने अस्तित्व में डूबे तेरी नींद को,
एक आवाज़, कर रिवाज़ों को नरक दंड में स्वाहा,
संकोच त्याग, पकड़ अरमानों की पगडंडियों को,
शैतानी रूप ले मेरे मन और लगा ठहाके संसार पे,
जगा जो तू आज,क़त्ल न होने दे तेरी अनकही का,
हिंसक कर सहमी सोच,चाहें नाजायज़ उसकी राह,
जो न हो जुनून, हर पल कर खुद का दाह संस्कार...

दिल...



हुस्न-ए-पतझड़ की हमाकत सा दिल,
अंगारे तालुक में सुलघ्ता सा दिल,
कातिल है मेरे अरमान-ए-ख़ास का?
फिर परिंदा ख्वाइशों पे उड़ने की जिद्द,
डूबने चला फिर ख़्वाबों के सराब में,
तर्बिअत पाज़ीर पतझड़ में क्या तलाशे?
भीगा जब हर लम्हा तक्दीस-ए-फरहत में...













Monday, January 9, 2012

गोलगप्पे...









उनसे तवज्जोह का ये दिल यूँ मासूम हुआ
कि दोज़ख में भी तख़्त ओ ताज बना बैठा,
हम तो उस गुलिस्तान के मुरीद हैं ग़ालिब
जहाँ काँटा भी निगाहों में मोहतरम बना बैठा

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काँटा दिल में चुबेगा
आशिक़ को यह इल्म तो था
पर गुलिस्तान में दिल का रक्स होगा 
इतना मजबूर कोई फूल न था

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वो आये हमारी अलेह्दगी में गुल की तरह
कि नज़्म फिर ख़ुशबू बन बेहने लगी
फिर हुई जो ज़माने से वादा खिलाफी
मोहब्बत हर काफ़िर को शायर कहने लगी

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ऐ खुदा तुझसे वफा का मुझे ऐसा तोहफा मिला
कि अपनी ही बस्ती में आशियाँ ना मिला
यूँ तो आये कितने हमदर्द लगाने चोट पे बाम
पर रोटी को चाँद समझने वाला कोई ना मिला...

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जो तू इन्सान हुआ, क्या-क्या ना हुआ,
कायनात का हंसी नगीना तू हुआ,
यूँ तो बक्शी है खुदा ने गरीब को रोटी
पर चूल्हे में पकता पसीना तू हुआ 


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यूँ तो गुलाब तेरी आबरू आज बदली सी नज़र आई
पर वक्त का तकाजा है कि गुलशन आज रकीब हुआ है,
यूँ तो बदली तारीख फिर आवाम को बेनज़ीर करने आई
पर बिस्मिल आज भूखा मज़हब में फिर गरीब हुआ है...


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ये मेरे इश्क़ की कैसी बेकशी है बिस्मिल्ल
कि शम्शान में गुल खिलाने की ज़िद करता है,
यूँ तेरे नाम पर मेरी फ़रियाद करता वो ख़ालिद
आज मेरी शबनम का लहू अपने नाम करता है


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लगाने चले जो हम ज़माने के मालोल पर हिज्र-ऐ-बाम,

हजरतों ने तारावत को अपने नकाब का गुलाम कर दिया 

फिर आये जो लेकर दुआओं के कफ़न मेरी कब्र पर रहनुमा,
ऐ मौत तेरी खुशनसीबी ने मुझे दिलों का जमींदार कर दिया...

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एक बेकशी है हिज्र तेरी चौखट पे बिस्मिल,
कि ज़माने का मलाल भी अब तबस्सुम सा लगता है,
तेरे नाम की यूँ नुमाइश करता हर शख्स भी मुझे,
सादत में रहने वाले तेरे फरिश्तों सा लगता है...

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कश्तियाँ डूब गयीं तबाहियों की लहरों में
और तुमने सिर्फ खिवईये को देखा,
हुनर पिघल गए इस ज़माने की घसब में
और तुमने सिर्फ एक मामूली एब को देखा
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हे समुन्द्र की मदमस्त लहरों, यूँ खिलखिलाके ना हंसों मुझ पर ,
कहीं मेरे वक्त सी फिसलती रेत तुम्हारी उम्र ना बयान कर दें...
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मौला किया जो तेरे नाम का सजदा बनके बेनज़ीर,
हज़रतों में यह फलसफा मोषिकी बन बस गया,
होके काफ़िर जब पूछा कौम से तेरे घर का पता,
ज़माने का मलाल आषिकी बन डस गया...

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मेरी शबनम अश्क बहाती रही ज़माने की तबाहियों पे,
और हज़रत रंजिशों के गुल खिलाते गए अपनी आढ़ में...

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काफ़िर का कहाँ कोई नाम होता है,
अपना तो हर लफ्ज़ खामखाँ होता है,
क्या गम मिट जाये शक्सियत भी अगर,
अपना तो वजूद ही बदनाम होता है...
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तेरे वजूद पर यूँ हुए हम निसार,

की आज फिर तबस्सुम है बेक़रार,

बिखरी रस्ते पर चाँदनी इस कदर,

जैसे माज़ी में बहती तेरी हंसी की लहर...

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ना पूछ की मेरे हाथों में आज क्यूँ है ये जाम 

ये उस रात की खता थी जो कर रही हर सहेर मुझे बदनाम...

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कहते हैं लोग जाम हर अश्क को अपनी पनाह में छूपा लेता है 
पर कमबख्त अश्क क्यूँ फिर हर जाम को अपने बेहने का हिसाब देता है...
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आँखों की ओस से लिख दूँ कोरे कागज़ पे कुछ बात
तेरी वाज़-ए-बू में फैले मेरे अक्स से कर ले मुलाकात

वो पल था जब तेरे वक़्त के गलीचे में था मेरा दिल शबनम 

आज मेरे ही तकिये पे तेरे ख्यालों की नमी हुई है कुछ कम... 


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बिखरे हैं चौबारे पे शाख से पत्ते इस कदर
जैसे सूखा हो ख्यालों में इश्क का सफ़र,
हम पतझड़ में भी तलाशें तेरे नूर का दीदार,
पर हसरतें ही रह जातीं बनके चार-मीनार...

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शब-ए-दौलत तेरी खुशबू की सहेर नहीं होती,
होती भी है तो मेरे अंजुमन नहीं होती,
नवाबी दुनिया रुक्सत कर अपनी ये दौलत, 
देख काफ़िर कि मल्कियत पे खुदा की कैसी मेहेर होती...
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       यूँ तो फना होने आये थे हम तेरी नुमाइश में,

पर जज़बातों ने तेरे दिल को रकीब बना दिया,

हर लम्हा गुज़रते थे हम तेरे नाम की मज़ार पे,

और तेरे इश्क ने वजूद को खाक में मिला दिया...

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अगर फलक तक तेरे सजदे का उन्स होता, 
तो ख़ामोशी में भी तेरे तिलिस्म का दीदार कर जाते...
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हर शायर जैसा नाम रहे ऐसी बात खामखां ना थी,
मन कुन्तो मौला की काफ़िर मैं जग सरे आम ना थी,
लिखी मन की बानी फिर भी मैं बदनाम ना थी...
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तुम्हारे अल्फाजों की मोषिकी में मेह्फूस,
तम्मनाओं के धागों से आशियाना बुना,
मोहब्बत के सिरों को बारीकी से जोड़ रही,
न रह जाये गिरह रिश्ते के मखमल में,
इसी चद्दर को ओड़े मेरी रूह इंतज़ार करेगी हर मौसम... 
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लालच और वासना इन्सान के दो फेफड़े हैं,
व्यक्ति अपनी प्रवृति के अनुसार इन पर नियंत्रण रखता है...
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मेरे अंजुमन में सजती ताज़ी ओस बीबा,
मखमल ज़ुल्फों की खुशबू का महकाती...
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वस्त्रहीन खड़ी मेरी परछाई,
सत्य के भ्रम से रहस्मय,
पलचिन सुकून की काफ़िर,
तलाश करे आजीवन पूर्ति की...
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नूर-ए-पतझड़ सुर्ख हवा पे सवार,
यार तेरे चौबारे से गुज़रे ऐसे,
की हर पत्ता आहिस्ता से उड़के,
मेरे आँगन की रौनक बन जाये...
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हवा-ए-सर्द कुछ इस तरह गुनगुना,
की मेरी ज़ुल्फों में फिरती उंगलियाँ,
उन्स-ए-महबूब के ख्वाबों में गुम,
होठों के मखमल को महसूस कर,
फलक-ए-सजदा कर आयें...
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साँझ होती धुआं मेरे अफसानो की,
तेरी नज़म की चौखट पे रंगीन तितलियाँ...
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खामोश आईने से रूबरू होती मेरी आर्ज़ू-ए-फकीरा,
नाकामियों में इश्क और कलम का नूर सजाती,
मोहब्बत की बारिष में भीगती रूह आज बेख़ौफ़,
और तमन्नाएँ चलीं ज़माने से कुछ गुफ्तगू करने...
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दीदार-ए-चिलमन रकीबों ने सजाया आंगन मेरे,
शुक्रिया उनको जो न पहचाने मल्कियत काफ़िर की...
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पलकों के किनारे छुपी ख्वाबों की कत्पुतली,
हिजाब-ए-सूफी ओढ़े चलीं तसव्वरी की सेर पे,
बंद हथेलियों में जकड़े हुए घाफिल का सच,
आवारा फिरता में हो कर खुद से मारूफ़...
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कलम न मुतास्सिर सुर्ख अश्कों की स्याही में,
लफ़्ज़ों की अफ्सुर्दगी से ख्याल बग़ावत करते...
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बखुब रौशनी करती तामीर-ए-पशैमानी,
दिलकशी पतंगें आर्ज़ू चाहें स्याह-सफ़ेद,
पाकीज़गी खामोश मारे डंक मोशिकी बन...
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प्रीत की बलिहारी,अंगना नैनं सेज सजाऊँ,
तुम्हरे संग मीत लागी,रूठा चंदा काहे मनाऊँ,
झांझर पग पग बोले, पिया मिलन क्यूँ न पाऊँ...
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बिलवारी रोशन तेरी आँखों के जुगनू,
भिकरे मेरी अज़ाब-अब्दी के पावन पर,
एकांत-ए-माज़ी पिरोये तेरे लफ़्ज़ों के मोती,
मेरे बधिर एहसास पे करे तखरीब कारी...
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साँस पिंजरे में कैद पंछी जैसी फहराती है,
कहते हैं की ताज़ी हवा को महसूस करो,
साँस को संतुलित कर लम्बी उड़न भरो,
क्या उन पंछियों के सीमित पंख जैसे?...
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ख्वाबों की बूँदें चापलूसी की धूप सेकने चल पड़ीं,
और मैं रही इन्द्र धनुष के छोर पे घड़ा तलाशती ... 
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अतृप्त भूमि पे थिरकती बंजर आत्माएं,
इच्छाओं के बरसने का इंतजार करती हुई,
अपने भावों से तृप्त हो कर संतुष्ट होती हैं... 
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गुज़रे पल की राख टटोल के देखना ज़रा,
मेरी मुस्कान घर-घर खेल रही हो,
अब भी शायद... 
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मूर्छित जीव मैं गुम अपने दायरे में,
वक्त के साथी बने सिर्फ मेरे कदम,
क्या तुम उस मंत्र को जानते हो,
जिसके इंतज़ार में मेरी रूह झपकियाँ ले रही?
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तन्हाई में कुछ गुफ्तगू करने की,
सोची ही थी अपने वजूद से,
पर रूह अजनबी शख्स कि तरह, 
मुदाखिलत कर गयी...
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धुंध-ए-हक़ीकत से मैला सा है आइना मेरा, 
मौला झोली में डाल दे मेरी यकीन-ए-बेनज़ीर,
कि बे सबरी और उल्फत के शरारे में नाचती रूह,
मेरे आईने में ख्वाबों का अक्स देख पाए...
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Thursday, January 5, 2012

धूप



धूप के कण-कण में पिरोई तुम्हारी धडकनों से,
रोशन होता अंजुमन के साथ मेरे जज़बातों का कोहरा,
यह धूप चीरती हुई मेरी रूह के खामोश अल्फाजों को,
आँखों में हंसी,लबों पे नमी बनके घर कर गयी है,
ख़्वाबों की मिटटी से बने मेरी आर्ज़ू के घड़े,
अब तुम्हारे इश्क की गर्मी में सूखने रख दिए हैं...

Tuesday, December 20, 2011

मायावी...



चमन में फूलों की सेज मायावी,
तारों की चादर ओढ़े रात मायावी,
चाँद से छनती किरण मायावी,
गोधूली में छुपा संसार मायावी,
हर युग में पनपते जीव मायावी,
मंदिर में बिखरी दुआ मायावी,
सजदा करता काफ़िर मायावी,
राज्य में भौंकते कुत्ते मायावी,
फेंकी हुई रोटी के टुकड़े मायावी,
प्रेम से होठों पे कम्पन मायावी,
होठों पे झूलते लफ्ज़ मायावी,
समय का हर एक पल मायावी,
पल में सैकड़ों श्वास मायावी,
तन पे पड़ा कपड़ा मायावी,
नंगेपन में छुपती शर्म मायावी,
भ्रष्टाचार की भूख मायावी,
सच के डंके का शोर मायावी,
आखों के कोने में नींद मायावी,
पलकों पे सिकते ख्वाब मायावी, 
श्मशान में जलता मुर्दा मायावी,
जीवन मृत्यु का चक्र मायावी,
मैं मायावी, तू मायावी,
यह सृष्टि,  यह ब्रह्मांड मायावी|

Tuesday, December 13, 2011

पंछी...




  अलविदा कहते उन पंछियों को आवाज़ लगाती मैं
ले जाओ लिफाफे में बंद मेरी धड़कनें पिया की गली,
कह दो लाल रंग उसके नाम का इंतज़ार करता है ।
इन पंछियों को अजब सी घिन सिंदूरी लालिमा से,
शायद पंख खून की कीचड़ के धब्बों से सन गए हैं ।
सावन में पतझड़ जैसे मायूस वह अब चहचहाते नहीं,
काले धुंए में पिया का घर धुंधला सा नज़र आता उन्हें
और मैं उम्मीद के दाने छज्जे पर बिखेरते रहती ।

Monday, November 28, 2011

प्यासा सावन




पलकों पे गिरती बारिश की बूँदें मुझसे कहतीं,
मेघ की रिमझिम से पहले क्यूँ भीगी है तू,
कुछ चंद मोतियों को अपनी हथेली पर लेकर,
उन बीते हुए लम्हों के आँचल में फंस जाती,
याद है उस बरस भी सावन के झूले पड़े थे,
गीली मिट्टी की ख़ुशबू से महकी थी हवा,
आज भी सावन के झरोखे मुझे घेरे हुए हैं,
पर आज काँटों से भरा है इनका आँचल,
भीग गयी कायनात आज फिर एक बार,
न जाने मेरी रूह क्यूँ रह गयी प्यासी?



Thursday, November 24, 2011

साया















पार्क की बेंच पर बैठी 
वो हल्के भूरे गेसू वाली,
सफ़ेद परिधान में 
अपनी ज़ुल्फों को सहलाती,
उस बे-रंग में वह सुंदरी जैसे 
कोई भ्रम या छलावा हो,
एक परी जो अपनी लटों में
धूप के मोती पिरो रही हो,
शायद वो गुज़री रात के पलों का 
एक छल थी, एक सपना,
जो सांसों की सौदेबाज़ी के बाद 
मुझे नज़र आ रही थी |


आते - जाते लोगों को वह
अपनेपन की नज़र से देखती,
जैसे सब किसी रंगीन कल्पना के पात्र हों,
उसके पंखुड़ी जैसे होठ
जीवन का फ़लसफ़ा बोल रहे थे,
एक नीरस सा रंग
उसके होठों से टपक रहा था,
कुछ बेचैन हो के अपने रस्ते का रुख
मैंने उसकी तरफ मोड़ा
नयनों की आँख मिचौली जब टूटी
सीने में कम्पन उठ आई |


उसकी काली आँखों में एक खालीपन था
जैसे कोई काला साया हो,
वो साया शायद हंस रहा था
गुज़री रात के उन निरदई पलों को याद कर,
उन सांसों का हिसाब मांग
मेरी रूह को उसने वस्त्रहीन कर दिया था, 
गाड़ियों के शीशों पर टिमटिमाती धूप ने
उसका ध्यान मेरी और खींचा,
समय और जीवन का वो शतरंज का खेल 
उसे रोकना पड़ा अचानक |



समय को हराने के ख्याल से शायद 
उसने मुझसे उस दिन टाईम पूछा था,
घड़ी की सुईयों का इंसान की सांसों से
अजीब सा मेल उस दिन समझा मैंने,
काले साये के समय-चक्रव्यूह में,

निहत्था खड़ा था मैं,
अरसे बाद अपोज़िट सेक्स के बोल ने
एक पत्थर को झंझोड़ दिया था |

उस शब्दावली ने मुझे आखरी जाम
की तरह बेबस कर दिया,
उसके सवाल का उत्तर 

मैं अफ़सोस से दे नहीं पाया,
मेरी बदकिस्मती का शिकार 
एक बार फिर मेरा सपना बन गया,
चंचल सी हँसते हुए उसने पूछा, 
"आप समय के पाबंद नहीं?"
जीवन-मृत्यु को तराज़ू पर तोलने वाला 

समय का इल्म क्या जाने?
पर आज समय से गुज़ारिश कर,
मन सपनों के  टुकड़े समेटने लगा ।

Tuesday, October 18, 2011

शख्सियत


आज फिर है उसके चेहरे पर खुशनुमा मिजाज़
मुद्दत के बाद मिली तकदीर उसे जागीर में,
जमघट से अलग अब नज़र आता है वो,
वक़्त मोहताज अब उसकी कद्रदानी का,
कुतरी हुई तमन्नाएँ भी हैं अब पूरी वफादार,
आर्ज़ू के प्याले गुम हैं खामोश मोशिकी में,
मोहब्बत व नफ़रत के मोती पिरोता वो आँखें मूँद,
कण कण में फैला उसका रुतबा, पर शख्सियत नहीं...












Monday, October 3, 2011

फेसबुक





कैसी अजब जगह है फेसबुक,जहाँ लोग यूँ ही मिल जाते हैं,


जाने-अनजाने लोगों से अपने दिल का हाल सुनाते हैं ,


दो अजनबी बन जाते दोस्त रहकर सात समुन्दर पार,


लेकिन अपने घर पे है अटपटा सा उनका व्यवहार,


कई दोस्त ऐसे मेरे भी बने जिनका न देखा चेहरा,


कुछ मुट्ठी भर हंसी के साथी, कुछ कर गए दिल में बसेरा,


फेसबुक पे आके लगा आ गए बचपन के दिन लौट,


पर उन अज़ीज़ रिश्तों ने पहन लिया था मुखौटा,


खुश हूँ उसने मुझे मिलाया मेरी खोयी पहचान से,


वही  जो मेरी ख़ामोशी को भी पढ़ लेता आराम से,


जाते हुए एक सवाल पूछती हूँ आप से 


"क्या मैं हूँ बड़ी नादाँ ?"

या फेसबुक जगह है मेरे लिए अनजान?"..

Tuesday, September 13, 2011

प्लेटफ़ॉर्म






भोर होते ही मुसाफिरों के लिए बाहें खोल देता वो
कभी गन्दा कभी साफ़ रहकर भावों को गुनगुनाता वो
ट्रेन की गति से धड़कता उसका दिल, ध धक् ध धक्
इश्क में हाथ थामे प्रेमी कहते, ' समय थोड़ा और रुक '
कॉलेज बुक्स, ऑफिस ब्रिएफ़्केस हर कोई उठाता बोझ
मुस्कुराते हुए कहता खुद से क्यूँ आते हम यहाँ रोज़?
गुज़री रात के किस्से कहानियां गुम हो जाते इसकी धूल में
कुछ मुलायम कुछ खुरदुरे सपने छुपे इसके सीने में
राही को देता दिनभर की भागम भाग के लिए हिम्मत
सजती पल- पल यहाँ थोड़ी काली थोड़ी सफ़ेद किस्मत
काश बोल सकता, तो बयान करता यह लोगों के मनसूबे
जान जाते हम शायद कहाँ ज्योत जली, कहाँ दिये बुझे ...

Wednesday, August 3, 2011

"जूठन"



मायूस ,बेबस चुपचाप खड़े हुए,
ललचाई नज़रों से ख़ाली करता वो,
वाइट कॉलर वालों का जूठन,
मजबूरी उसकी 4000 प्रति महीने की आमदनी
फिर वही सोच क्या आज घर में रोटी बनी ?




प्लेट में पड़ा वो पुलाव, आधी मिठाई,
दो वक़्त की रोटी के लिए लड़ाई,
ललचाई नज़रों से खाली करता वो,
वाइट कॉलर वालों का 'जूठन ',
और नाउम्मीदी  के संग सफ़र तय करता राही ।




पहला निवाला लेते ही,मुंह सिकोड़ के,
लोगों का कहना "यार बेकार खाना है",
यह देख अपनी क़िस्मत से नाराज़,फुन्फुनाते हुए,
ललचाई नज़रों से खाली करता वो,
वाइट कॉलर वालों का 'जूठन ' ।












Tuesday, July 26, 2011

" इलेक्ट्रिक चूल्हा "






कुछ गिने चुने स्टील के बर्तन,
ज़रूरत के हिसाब से मसाले,
बस इतना ही था उस भावनाहीन कमरे में
उस दिन जैसे गृहिणी की रसोई बन गया था
वो कोने में पड़ा 'इलेक्ट्रिक चूल्हा' |



वो 2/2 की जगह अन्नपूर्णा  का स्वागत करने लगी,
कुटुंब की दास्तान सुनाती जैसे दाल-सब्ज़ी,
कई दिनों से वो साधारण रूप वाला, 
ज़ंग खाता हुआ - जलने पर,
 हमारे प्यार जैसे जगमगा उठा ' इलेक्ट्रिक चूल्हा ' |



तुम्हारा मेरे हाथ से निवाले को लपक कर खाना,
4-5 वर्ष के बालक जैसे  टुक - टुकी  लगाये 
थाली में पड़े दाल भात को ताकना,
हमारे इसी प्यार की मासूमियत को देख,
गर्व और ख़ुशी से झूम उठा वो ' इलेक्ट्रिक चूल्हा ' |








Tuesday, July 19, 2011

"तेरी - मेरी ज़िन्दगी"


तेरा ज़िन्दगी में आना जैसे ओस की ताज़गी हो,
तेरी बातें जैसे झींगुरों की मौशिकी हो,
तेरी हंसी से जगमगाती तारों की छावनी में रात हो,
तेरा एहसास जैसे सूनेपन का मलहम हो,
तेरी बाहों में रहना जैसे मेरी इबादत हो,
तेरा इश्क काँटों पे चलने की राहत हो,
तेरे होटों को चूमना जैसे जाम का प्याला हो,
तेरा मुझ में सामना जैसे पतझड़ के बाद सावन हो,
तेरी आँखें मेरी सादगी का आइना हो,
तेरी मौजूदगी मेरी धड़कनों की ज़िन्दगी हो,
तेरी रूह से गुफ्तगू जैसे मेरी रूह का जूनून हो,
तेरी ख़ामोशी, तेरी नाराज़गी जैसे मौत का पैगाम हो |

Thursday, July 14, 2011

ख्वाब - बस यूँ ही !


मेरे दिल में ख़्वाब तो बहुत हैं,
मगर बयान करने को शब्द नहीं
बस देख ले एक नज़र आकाश में बादलों को -
कुछ काले कुछ सफ़ेद बदल,
बस ऐसे ही गहरे हल्के हैं मेरे ख़्वाब |



इन ख़्वाबों में कई बातें सोची हैं,
पर सब बातों की वजह नहीं जानती
बस देख ले दूर समुन्दर में - 
पानी के अनेक रंगों को,
बस ऐसे बदलते से रहें मेरे ख्वाब |



आर्ज़ुओं में ख्वाब या ख्वाबों में आर्ज़ू ,
नहीं जानती किसकी महिमा श्रेष्ठ है,
बस देख तेज़ बहती हवा को -
कभी इस छोर, कभी उस छोर,
बस यूँ ही मचलते से हैं मेरे ख्वाब ।


Saturday, July 9, 2011

मेक--अप


लैक्मे के काउंटर पे जाना उसने छोड़ दिया था
क्यूंकि अब उसके "होठों का मधु" ही उसकी लिपस्टिक था
वो चेहरे के दाग छुपाना,फेस पावडर या कॉम्पैक इस्तेमाल करना ,
उसके "हाथों के स्पर्श" के आगे फीका लगने लगा |
ऑफिस से आके वो सिर्फ पानी से निकली
उसकी पसीने की खुशबू से महकती टीशर्ट पहन लेती|
वो जिसे पर्सनल हाइजीन का बुखार था
उस "घिन'' को भी अपने प्रेमी का एहसास समझने लगी |
वो बेडरूम का फुल लेंथ आईना कई बार उसके चहेरे की
सुन्दरता का वर्णन कर चूका था ,
पर उसकी खूबसूरती और सादगी का आईना सिर्फ उसके "प्रेमी की आँखे" थी |
बस एक नया गहरा काला  काज़ल उसके मेक-अप  किट की एक मात्र ज़रूरी वस्तु था |
वो उसकी ज़िन्दगी में रौशनी काज़ल से भी गहरी कलि रात में लेके आया था,
उस दिन से वह उस लम्हे को अपनी आँखों में काज़ल लगा के "कैप्चर" करने लगी|