रिश्तों में शब्दहीन अवस्था, काले साये की उदारता में ढले हुए शमशान में पड़े कंकाल की तरह है| एक नीरस सूखापन उन दो या उससे ज्यादा व्यक्तियों के बीच नज़र आता है जहाँ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं होता| शब्द किसी भी रिश्ते में वरदान और अभिशाप दोनों का काम करते हैं, परन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि रूप कुछ भी हो, शब्द ही रिश्तों को उनका अस्तित्व देने वाली कड़ी है| एक उदहारण हम German निर्देशक Fassbinder की फिल्म 'Chinese Roulette' में देखते हैं, जहाँ Angela और उसके माता-पिता के बीच शब्दों की कमी होने की वजह से उनके रिश्ते में वैध कुछ भी नहीं रह जाता| 'Chinese Roulette ' के खेल का तत्व भी शब्द ही है, जिसे बातचीत से वंचित Angela फिल्म के सभी पात्रों का विवरण करने में इस्तमाल करती है|अर्थात शब्द ही सत्य है, जो हर व्यक्ति का समस्त,शुरुआत और अंत है|
Wednesday, February 29, 2012
शब्द ही सम्पूर्ण है
रिश्तों में शब्दहीन अवस्था, काले साये की उदारता में ढले हुए शमशान में पड़े कंकाल की तरह है| एक नीरस सूखापन उन दो या उससे ज्यादा व्यक्तियों के बीच नज़र आता है जहाँ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं होता| शब्द किसी भी रिश्ते में वरदान और अभिशाप दोनों का काम करते हैं, परन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि रूप कुछ भी हो, शब्द ही रिश्तों को उनका अस्तित्व देने वाली कड़ी है| एक उदहारण हम German निर्देशक Fassbinder की फिल्म 'Chinese Roulette' में देखते हैं, जहाँ Angela और उसके माता-पिता के बीच शब्दों की कमी होने की वजह से उनके रिश्ते में वैध कुछ भी नहीं रह जाता| 'Chinese Roulette ' के खेल का तत्व भी शब्द ही है, जिसे बातचीत से वंचित Angela फिल्म के सभी पात्रों का विवरण करने में इस्तमाल करती है|अर्थात शब्द ही सत्य है, जो हर व्यक्ति का समस्त,शुरुआत और अंत है|
Monday, February 27, 2012
धूल हूँ मैं
तुम्हारे कमरे के कोने में चिपकी धूल हूँ मैं,
जिसे तुम्हारे पैर जाने-अनजाने मुसाफिर बना लेते हैं|
लौटने पे तुम्हारी भीगी सी टी-शर्ट की चिपचिपाहट बन,
कई दिनों तक तुम्हारी खुशबू का एहसास करती रहती हूँ|
कभी किसी हवा के झोंके का साथ रहा,
तो मैं धूल तुम्हारे बिस्तर पे जमघट बना लेती हूँ|
इंतज़ार करती की कब तुम नींद में खो,
और मैं चुम्बन बनके तुम्हारे गालों पे चिपक जाऊं|
मैं धूल तुम्हारे नाखुनों में धीट जैसी जमी रहती हूँ,
की जब तुम पहला निवाला लो तो मैं चुपके से,
तुम्हारे शरीर का सफ़र तय करती हुई,
बिना किसी आहट के तुम्हारे दिल में स्थायी हो जाऊं...
Friday, February 24, 2012
विदेशों में भारतीय
मेरे चौबारे से उड़ती गोधूलि -
रंगीन बिन्दुओं से पूछ,
आम की कैरियों की सोंधी खुशबू,
क्या मुझ जैसी कद-काठी वालों को लुभाती है?
मेरे छज्जे पर वक्त-बेवक्त फिरते पक्षियों -
मेरी नींद जैसी असंतुलित धुन में,
शायद मखमल के बिस्तर पर,
पड़े उन छोटे लोगों से पूछ,
कैसी है मिठास वहां लोरियों की?
मेरे लहराते खेतों से चुने हुए दाने -
वहां मेरे रंग में ढले,
दिल के करीब किसी अजनबी से पूछ,
क्या वहां के चूल्हे पर सिकती रोटी से,
टपकती वो ही पुरानी उसकी लार?
Tuesday, February 21, 2012
आकर्षण की मृगतृष्णा...
जीवन में जो हम स्पष्ट आँखों से देख सकते हैं, वो ही सत्य नहीं होता, अधिकतर नज़ारे मस्तिष्क दवारा उत्पन्न किये गए मृगतृष्णा होते हैं, जिनके लोभ में इन्सान भावात्मक हो उठता है|हमारी पाँच इन्द्रियाँ मोहित हो कर एक ऐसी मनोकामना को जन्म देती हैं जो सच्चाई से अलग, अकल्पनीय पूर्ति की दिशा में सभी करनी व कथनी को मोड़ देती है|किसी घुड़सवार जैसे यह मनोकामना मनुष्य के विचारों से उत्पन उर्जा युक्ति को काबू कर, मायावी रूप से सुशोभित कर देती है|
"सब चमकती हुई चीज़ें सोना नहीं होती", परन्तु फिर भी हम इस चमक के लोभ में निहत्थे और बेबस हो कर बंदी बन जाते हैं, और एक खिचाव सा भावनाओं पे महसूस होता है, सत्य और भ्रम को न परख पाने की विवशता ही शायद इन्सान को कितनी बार निष्क्रिय स्तिथि में डाल देती है|ऐसी अवस्था में एक अयोग्य इन्सान, अपनी दूषित प्रज्ञा से प्रभावित, स्वयं के ज़मीर से विपरीत कार्य को ही सत्य और अनुशासित बताने के अलग अलग तर्क बनाता है |इसी नकारत्मकता से उत्पन धुंए से इन्सान भ्रमित होकर,मुखौटा पहन अपने ही अस्तित्व की तलाश सम्पूर्ण जीवन करता रहता है|
Wednesday, February 15, 2012
मैं
आग में भभकते पतझड़ के पत्तों की राख मैं,
बहा दो मुझे बनारस में बहती गंगा के तट पे,
की बहती धाराएँ मुझे डाल दें उन वादियों में,
जहाँ कीचड़ में खिलता जंगली फूल बन जाऊं,
जिसे कोई रमता जोगी तोड़कर झोली में डाल,
किसी मंदिर की चौखट पे अर्चना में चढ़ा दे,
फिर किसी पुजारी के हाथों से प्रसाद में मिलके
किसी गरीब की प्रार्थना का नतीजा बन जाऊं,
और जब वो मुझे अपनी चौखट का गर्व बना ले,
तो मैं फिर से मुझसे बिछड़ी हुई बसंत ऋतु में,
अपनी खुशबू फेलाके सुकून से बहती चलूँ |
Monday, February 13, 2012
ख्वाब
ख्वाब पुर-असरार फिरते पंछियों का रेहनुमा आवारा,
उनके परों पे बैठ मेरे दिल का आहंग लेके आया,
बहारों से मुकरर होता तकदीर-ए-फल्सबा का ग़ुलाम,
वाज़-ए-बू बनके रह जाता मेरी उम्मीद में आके पैदार,
फिर नूम तावाज़ा होती मेरी रूह इसके जादू में बहबूद,
गुमनाम दस्तक देती रहती इसकी मिठास को माज़ी,
आहिस्ता मेरे रक्त के गलीचे का शबनम बन जाता,
बेखुब चुप्पी साधे सुबह की आयातों से रूबरू होता हुआ,
खालिद मुझसे पूछता "मेरी मंज़िलों की कौम क्या है?"
सपना
विशाल आकाश की बाहों में डूबी तारों की छावनी,
उसमें शान से अस्तित्व की मोहर लगाता हुआ,
जैसे कोई स्थिर आध्यात्मिक जीव अप्रभावित ,
शायद वो गंगा के सुखद तट पे पुकारती रात में,
अपने पलों को इकठ्ठा करने निकल पड़ा है,
बूँद-बूँद समेटता हुआ किसी महासागर जैसा,
पलकों के कोने में आकर बेठ जायेगा यह घुस्पेटिया |
Wednesday, February 8, 2012
"कुछ चुभता हुआ सा..."
डर को निकालने के लिए उसकी जड़ तक पहुचना ज़रूरी है, कैसे और कहाँ से आता है यह डर?क्या समाज डर उत्पन करता है, पर हम सब से ही तो यह समाज बना है, परन्तु फिर भी हम डर को नहीं मार पाते|समाज में स्वीकृति पाने के बाद भी कहीं कुछ फाँस जैसा दिल में चुभता , यह था डर, वो ही डर जो समाज ने मन में पैदा किया| पर समाज नहीं तो डर नहीं?, काश ऐसा कहना आसान होता, परन्तु डर जीवन-मृत्यु की चक्र के साथ रोम-रोम में किसी बिन बुलाये मेहमान की तरह घर करे बैठ जाता है...तो डर का बीज, सिचाई और उपज इन्सान के मन की ही देन हुई, इसलिए आज कल महसूस होता है कुछ "चुभता हुआ सा..."|
"डर हैवान सा खराश करता हुआ
जिंदा रखे मेरी रूह को ...|"
Monday, February 6, 2012
रात...
कोहरे में कंपकपाती रात, दस्तक देती मेरे दरवाज़े पे रात,
चाँद से मुह फेर अपने ही कालेपन के श्रृंगार से सुशोभित,
एक लोटा चांदनी के बदले सियाह्पन का राज़ खोलने आई
यह रात कहीं बिछड़ गयी थी अपने तारों की छावनी से,
टूटते तारे के इंतज़ार में तमन्नाओं की गठरी लिए बेठी थी|
मैंने कहा तू क्या करेगी अपनी हद का फल्सबा मुझे सुनाके
आखों में पड़ी किरकिरी के साथ उसे भी सुबह भूल जाउंगी,
अँधेरे पे गर्व करती रहस्मय ढंग से मुझ पे हंसी वो कमीनी
और बोली "लाल है मेरा चाँद निहत्था खड़ा काले धुंए में"
कोहरे में कंपकपाती रात दस्तक देती मेरे दरवाज़े पे रात|
चाँद से मुह फेर अपने ही कालेपन के श्रृंगार से सुशोभित,
एक लोटा चांदनी के बदले सियाह्पन का राज़ खोलने आई
यह रात कहीं बिछड़ गयी थी अपने तारों की छावनी से,
टूटते तारे के इंतज़ार में तमन्नाओं की गठरी लिए बेठी थी|
मैंने कहा तू क्या करेगी अपनी हद का फल्सबा मुझे सुनाके
आखों में पड़ी किरकिरी के साथ उसे भी सुबह भूल जाउंगी,
अँधेरे पे गर्व करती रहस्मय ढंग से मुझ पे हंसी वो कमीनी
और बोली "लाल है मेरा चाँद निहत्था खड़ा काले धुंए में"
कोहरे में कंपकपाती रात दस्तक देती मेरे दरवाज़े पे रात|
Tuesday, January 31, 2012
नन्ही स्त्रियों की रहस्मय कामुकता(sexuality)...reading Lolita...
क्या हम नन्ही स्त्री की कामुकता का अनुमान साधारण व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और भावप्रधान तत्वों के अनुसार लगा सकते हैं?नन्ही कोमल स्त्रियों के लिए sexual desires जैसे शब्द पुरे महत्व और संजीदगी के साथ कहे जा सकते हैं?क्या लोगों का और इन तितलियों का अवलोकन इन शब्दों के प्रति एक सामान गलती से भी होता होगा?स्त्री जाती में hormonal growth कुछ 12-13 वर्ष की आयु से आरम्भ हो जाती हैं, जब उन्हें उनके गुप्ताँग और उनसे जुड़े स्पर्शज्ञान का एहसास होता है| इसी समय वो एक बालिका और स्त्री के बीच के मझदार में अपने आप को फंसा और शायद निहत्था महसूस करती होगी| सोचने की बात यह है की इस नन्ही स्त्री के मन में आकर्षण किस प्रकार का उत्पन्न होता है? क्या उस डर और झिझक के भीतर दबी हुई राइ के दानों जैसी शारीरिक ज़रूरतें अपनी चरण सीमा तक पहुँच पाती होंगी?इसी पेचीदा सवाल का जवाब ढूंढ़ते हुए वो teenage के मध्यम स्तर तक पहुँच जाती है जो की 15-17 वर्ष की आयु होती है| इस समय उसके मन का संकोच और शारीर का बेढोल रहना भी कम होने लगता है, इसका सबसे उप्रयुक्त और सहमत उत्तर hormonal changes की गतिविदियों में स्थिरता आना है|यह बात की शायद वो अपनी शारीरिक ज़रूरत को धीरे धीरे समझ रही है किसी सभ्य व्यक्ति के सोच से बहार क्यूँ है? उसका नीरस बेरंग सा रहना या बगावत करना शायद उसकी यौन इच्छाओं से उत्पन हुआ भावात्मक विस्फोट होगा|उससे उम्र और कद में ज्यादा सयाने लोग उसकी इस प्रकार की नाजायज़ सी ज़रूरत को शायद उसका बचपना समझ कर टाल देते हैं या फिर डांट फटकार मारकर उसे स्वयं अपनी ही कामुकता के भंवर में गोते लगाती हुई छोड़ देते हैं|मासूमियत का धागा चंचलता के मोतियों में से गुज़रते हुए उसे पूरी स्त्री में कब परिवर्तित कर देता है उसे वो और उसके आस-पास के लोग भी नहीं समझ पाते| प्रेम और वासना के बीच खिंची रेखा का तात्पर्य हर स्त्री के नज़रिए से उसके teenage के अनुसार भिन्न भिन्न कल्पना शक्ति में परिवर्तित हो जाता है|अंत में प्रशन यह उठता है की क्या वो नवजात स्त्री, शारीरिक और मानसिक दोनों सन्दर्भ में, अपने यौन सम्बंधित जूनून को सही ढंग से समझ पाती है या नहीं?...
Sunday, January 29, 2012
शोक...
मैं नहीं जानती की शोक के समय सहानुभूति के कौन से शब्द पीड़ित को बोले जाते हैं,यह इसलिए नहीं की मेरा यह मानना है की आत्मा मृत्युंजय है और कुछ समय बाद उस गुज़रे हुए व्यक्ति का पुनः किसी अन्य रूप में आगमन होगा,परन्तु सत्य यह है की मैं शोक सभा में प्रस्तुत जनों की दुख़ की सीमा को भांप नहीं पाती,यदि कोशिश करती हूँ तो मन में सवाल उठता है की जब उनका उस मृत व्यक्ति के जीवन में पहला दिन हुआ होगा तो उन दोनों की मानसिक और शारीरिक स्तिथि कैसी होगी?
क्या अपने प्रेम और हर्ष की सीमा को वो लाँघ पाए होंगे या फिर उनका रिश्ता समय और संसार की बढती गतिविदियों के साथ कुछ धुंधला सा हो गया होगा?ऐसी किसी बेढंगी सी सोच में पड़ कर मैं उस शोक ग्रस्त व्यक्ति के अंतर्मन को टटोलने की कोशिश न करके उस पल एकाएक जो शब्द मुह से निकलते उन्हें ही उप्रीत समझ अपनी प्रस्तुति का सबूत जैसी उसे दे देती|उस मृत सफ़ेद चद्दर में लिपटे इन्सान के भावों का एहसास मुझे ज्ञात नहीं हो सकता,शायद होता तो कोशिश करती की बाकियों जैसी मेरी आँखें भी नम हो जाएँ|तब तक मृत्यु के समय भावों के एहसास को मुझे समझने की शायद ज़रूरत नहीं या फिर किसी करीबी के गुज़र जाने का इंतज़ार करूँ|
Tuesday, January 24, 2012
दाह-संस्कार
झंकार उठती है समय के गुमशुदा अंतराल में,
जगाता कोई अपने अस्तित्व में डूबे तेरी नींद को,
एक आवाज़, कर रिवाज़ों को नरक दंड में स्वाहा,
संकोच त्याग, पकड़ अरमानों की पगडंडियों को,
शैतानी रूप ले मेरे मन और लगा ठहाके संसार पे,
जगा जो तू आज,क़त्ल न होने दे तेरी अनकही का,
हिंसक कर सहमी सोच,चाहें नाजायज़ उसकी राह,
जो न हो जुनून, हर पल कर खुद का दाह संस्कार...
Monday, January 9, 2012
गोलगप्पे...
उनसे तवज्जोह का ये दिल यूँ मासूम हुआ
कि दोज़ख में भी तख़्त ओ ताज बना बैठा,
हम तो उस गुलिस्तान के मुरीद हैं ग़ालिब
जहाँ काँटा भी निगाहों में मोहतरम बना बैठा
-----------------------------------------------------------------------
काँटा दिल में चुबेगा
आशिक़ को यह इल्म तो था
पर गुलिस्तान में दिल का रक्स होगा
पर गुलिस्तान में दिल का रक्स होगा
इतना मजबूर कोई फूल न था
------------------------------------------------------------------------
वो आये हमारी अलेह्दगी में गुल की तरह
कि नज़्म फिर ख़ुशबू बन बेहने लगी
फिर हुई जो ज़माने से वादा खिलाफी
मोहब्बत हर काफ़िर को शायर कहने लगी
--------------------------------------------------
ऐ खुदा तुझसे वफा का मुझे ऐसा तोहफा मिला
कि अपनी ही बस्ती में आशियाँ ना मिला
यूँ तो आये कितने हमदर्द लगाने चोट पे बाम
पर रोटी को चाँद समझने वाला कोई ना मिला...
---------------------------------------------------------------------
------------------------------------------------------------------------
वो आये हमारी अलेह्दगी में गुल की तरह
कि नज़्म फिर ख़ुशबू बन बेहने लगी
फिर हुई जो ज़माने से वादा खिलाफी
मोहब्बत हर काफ़िर को शायर कहने लगी
--------------------------------------------------
ऐ खुदा तुझसे वफा का मुझे ऐसा तोहफा मिला
कि अपनी ही बस्ती में आशियाँ ना मिला
यूँ तो आये कितने हमदर्द लगाने चोट पे बाम
पर रोटी को चाँद समझने वाला कोई ना मिला...
---------------------------------------------------------------------
जो तू इन्सान हुआ, क्या-क्या ना हुआ,
कायनात का हंसी नगीना तू हुआ,
यूँ तो बक्शी है खुदा ने गरीब को रोटी
पर चूल्हे में पकता पसीना तू हुआ
--------------------------------------------------
यूँ तो गुलाब तेरी आबरू आज बदली सी नज़र आई
पर वक्त का तकाजा है कि गुलशन आज रकीब हुआ है,
यूँ तो बदली तारीख फिर आवाम को बेनज़ीर करने आई
पर बिस्मिल आज भूखा मज़हब में फिर गरीब हुआ है...
------------------------------------------------------------
ये मेरे इश्क़ की कैसी बेकशी है बिस्मिल्ल
कि शम्शान में गुल खिलाने की ज़िद करता है,
यूँ तेरे नाम पर मेरी फ़रियाद करता वो ख़ालिद
आज मेरी शबनम का लहू अपने नाम करता है
पर चूल्हे में पकता पसीना तू हुआ
--------------------------------------------------
यूँ तो गुलाब तेरी आबरू आज बदली सी नज़र आई
पर वक्त का तकाजा है कि गुलशन आज रकीब हुआ है,
यूँ तो बदली तारीख फिर आवाम को बेनज़ीर करने आई
पर बिस्मिल आज भूखा मज़हब में फिर गरीब हुआ है...
------------------------------------------------------------
ये मेरे इश्क़ की कैसी बेकशी है बिस्मिल्ल
कि शम्शान में गुल खिलाने की ज़िद करता है,
यूँ तेरे नाम पर मेरी फ़रियाद करता वो ख़ालिद
आज मेरी शबनम का लहू अपने नाम करता है
–---------------------–-------------------------
लगाने चले जो हम ज़माने के मालोल पर हिज्र-ऐ-बाम,
हजरतों ने तारावत को अपने नकाब का गुलाम कर दिया
फिर आये जो लेकर दुआओं के कफ़न मेरी कब्र पर रहनुमा,
ऐ मौत तेरी खुशनसीबी ने मुझे दिलों का जमींदार कर दिया...
------------------------------------------------------------------------
एक बेकशी है हिज्र तेरी चौखट पे बिस्मिल,
कि ज़माने का मलाल भी अब तबस्सुम सा लगता है,
तेरे नाम की यूँ नुमाइश करता हर शख्स भी मुझे,
सादत में रहने वाले तेरे फरिश्तों सा लगता है...
------------------------------------------------------------
कश्तियाँ डूब गयीं तबाहियों की लहरों में
और तुमने सिर्फ खिवईये को देखा,
हुनर पिघल गए इस ज़माने की घसब में
और तुमने सिर्फ एक मामूली एब को देखा
------------------------------------------------------------------------
हे समुन्द्र की मदमस्त लहरों, यूँ खिलखिलाके ना हंसों मुझ पर ,
कहीं मेरे वक्त सी फिसलती रेत तुम्हारी उम्र ना बयान कर दें...
---------------------------------------------------------------------------
मौला किया जो तेरे नाम का सजदा बनके बेनज़ीर,
हज़रतों में यह फलसफा मोषिकी बन बस गया,
होके काफ़िर जब पूछा कौम से तेरे घर का पता,
ज़माने का मलाल आषिकी बन डस गया...
-----------------------------------------------------------
मेरी शबनम अश्क बहाती रही ज़माने की तबाहियों पे,
और हज़रत रंजिशों के गुल खिलाते गए अपनी आढ़ में...
-----------------------------------------------------
काफ़िर का कहाँ कोई नाम होता है,
अपना तो हर लफ्ज़ खामखाँ होता है,
क्या गम मिट जाये शक्सियत भी अगर,
अपना तो वजूद ही बदनाम होता है...
----------------------------------------------------
तेरे वजूद पर यूँ हुए हम निसार,
की आज फिर तबस्सुम है बेक़रार,
बिखरी रस्ते पर चाँदनी इस कदर,
जैसे माज़ी में बहती तेरी हंसी की लहर...
---------------------------------------------------
ना पूछ की मेरे हाथों में आज क्यूँ है ये जाम
ये उस रात की खता थी जो कर रही हर सहेर मुझे बदनाम...
-----------------------------------------------
कहते हैं लोग जाम हर अश्क को अपनी पनाह में छूपा लेता है
पर कमबख्त अश्क क्यूँ फिर हर जाम को अपने बेहने का हिसाब देता है...
-----------------------------------------------
आँखों की ओस से लिख दूँ कोरे कागज़ पे कुछ बात
तेरी वाज़-ए-बू में फैले मेरे अक्स से कर ले मुलाकात
वो पल था जब तेरे वक़्त के गलीचे में था मेरा दिल शबनम
आज मेरे ही तकिये पे तेरे ख्यालों की नमी हुई है कुछ कम...
-----------------------------------------------
बिखरे हैं चौबारे पे शाख से पत्ते इस कदर
जैसे सूखा हो ख्यालों में इश्क का सफ़र,
हम पतझड़ में भी तलाशें तेरे नूर का दीदार,
पर हसरतें ही रह जातीं बनके चार-मीनार...
-----------------------------------------------
शब-ए-दौलत तेरी खुशबू की सहेर नहीं होती,
होती भी है तो मेरे अंजुमन नहीं होती,
नवाबी दुनिया रुक्सत कर अपनी ये दौलत,
देख काफ़िर कि मल्कियत पे खुदा की कैसी मेहेर होती...
-----------------------------------------------
यूँ तो फना होने आये थे हम तेरी नुमाइश में,
पर जज़बातों ने तेरे दिल को रकीब बना दिया,
हर लम्हा गुज़रते थे हम तेरे नाम की मज़ार पे,
और तेरे इश्क ने वजूद को खाक में मिला दिया...
-----------------------------------------------
अगर फलक तक तेरे सजदे का उन्स होता,
तो ख़ामोशी में भी तेरे तिलिस्म का दीदार कर जाते...
---------------------------------------------
हर शायर जैसा नाम रहे ऐसी बात खामखां ना थी,
मन कुन्तो मौला की काफ़िर मैं जग सरे आम ना थी,
लिखी मन की बानी फिर भी मैं बदनाम ना थी...
---------------------------------------------
तुम्हारे अल्फाजों की मोषिकी में मेह्फूस,
तम्मनाओं के धागों से आशियाना बुना,
मोहब्बत के सिरों को बारीकी से जोड़ रही,
न रह जाये गिरह रिश्ते के मखमल में,
इसी चद्दर को ओड़े मेरी रूह इंतज़ार करेगी हर मौसम...
---------------------------------------------------
लालच और वासना इन्सान के दो फेफड़े हैं,
व्यक्ति अपनी प्रवृति के अनुसार इन पर नियंत्रण रखता है...
------------------------------------------------------
मेरे अंजुमन में सजती ताज़ी ओस बीबा,
मखमल ज़ुल्फों की खुशबू का महकाती...
------------------------------------------------------
वस्त्रहीन खड़ी मेरी परछाई,
सत्य के भ्रम से रहस्मय,
पलचिन सुकून की काफ़िर,
तलाश करे आजीवन पूर्ति की...
-------------------------------------------------------
नूर-ए-पतझड़ सुर्ख हवा पे सवार,
यार तेरे चौबारे से गुज़रे ऐसे,
की हर पत्ता आहिस्ता से उड़के,
मेरे आँगन की रौनक बन जाये...
-------------------------------------------------------
हवा-ए-सर्द कुछ इस तरह गुनगुना,
की मेरी ज़ुल्फों में फिरती उंगलियाँ,
उन्स-ए-महबूब के ख्वाबों में गुम,
होठों के मखमल को महसूस कर,
फलक-ए-सजदा कर आयें...
-------------------------------------------------------
साँझ होती धुआं मेरे अफसानो की,
तेरी नज़म की चौखट पे रंगीन तितलियाँ...
-------------------------------------------------------
खामोश आईने से रूबरू होती मेरी आर्ज़ू-ए-फकीरा,
नाकामियों में इश्क और कलम का नूर सजाती,
मोहब्बत की बारिष में भीगती रूह आज बेख़ौफ़,
और तमन्नाएँ चलीं ज़माने से कुछ गुफ्तगू करने...
----------------------------------------------------------
दीदार-ए-चिलमन रकीबों ने सजाया आंगन मेरे,
शुक्रिया उनको जो न पहचाने मल्कियत काफ़िर की...
-------------------------------------------------------------
पलकों के किनारे छुपी ख्वाबों की कत्पुतली,
हिजाब-ए-सूफी ओढ़े चलीं तसव्वरी की सेर पे,
बंद हथेलियों में जकड़े हुए घाफिल का सच,
आवारा फिरता में हो कर खुद से मारूफ़...
----------------------------------------------------------
कलम न मुतास्सिर सुर्ख अश्कों की स्याही में,
लफ़्ज़ों की अफ्सुर्दगी से ख्याल बग़ावत करते...
-----------------------------------------------------------
बखुब रौशनी करती तामीर-ए-पशैमानी,
दिलकशी पतंगें आर्ज़ू चाहें स्याह-सफ़ेद,
पाकीज़गी खामोश मारे डंक मोशिकी बन...
-----------------------------------------------------------
प्रीत की बलिहारी,अंगना नैनं सेज सजाऊँ,
तुम्हरे संग मीत लागी,रूठा चंदा काहे मनाऊँ,
झांझर पग पग बोले, पिया मिलन क्यूँ न पाऊँ...
-------------------------------------------------------------
बिलवारी रोशन तेरी आँखों के जुगनू,
भिकरे मेरी अज़ाब-अब्दी के पावन पर,
एकांत-ए-माज़ी पिरोये तेरे लफ़्ज़ों के मोती,
मेरे बधिर एहसास पे करे तखरीब कारी...
--------------------------------------------------------------
साँस पिंजरे में कैद पंछी जैसी फहराती है,
कहते हैं की ताज़ी हवा को महसूस करो,
साँस को संतुलित कर लम्बी उड़न भरो,
क्या उन पंछियों के सीमित पंख जैसे?...
-------------------------------------------------------------
ख्वाबों की बूँदें चापलूसी की धूप सेकने चल पड़ीं,
और मैं रही इन्द्र धनुष के छोर पे घड़ा तलाशती ...
-------------------------------------------------------------
अतृप्त भूमि पे थिरकती बंजर आत्माएं,
इच्छाओं के बरसने का इंतजार करती हुई,
अपने भावों से तृप्त हो कर संतुष्ट होती हैं...
------------------------------------------------------------
गुज़रे पल की राख टटोल के देखना ज़रा,
मेरी मुस्कान घर-घर खेल रही हो,
अब भी शायद...
------------------------------------------------------------
मूर्छित जीव मैं गुम अपने दायरे में,
वक्त के साथी बने सिर्फ मेरे कदम,
क्या तुम उस मंत्र को जानते हो,
जिसके इंतज़ार में मेरी रूह झपकियाँ ले रही?
-------------------------------------------------------------
तन्हाई में कुछ गुफ्तगू करने की,
सोची ही थी अपने वजूद से,
पर रूह अजनबी शख्स कि तरह,
मुदाखिलत कर गयी...
-----------------------------------------------------------
धुंध-ए-हक़ीकत से मैला सा है आइना मेरा,
मौला झोली में डाल दे मेरी यकीन-ए-बेनज़ीर,
कि बे सबरी और उल्फत के शरारे में नाचती रूह,
मेरे आईने में ख्वाबों का अक्स देख पाए...
-----------------------------------------------------------
Thursday, January 5, 2012
Tuesday, December 20, 2011
मायावी...
चमन में फूलों की सेज मायावी,
तारों की चादर ओढ़े रात मायावी,
चाँद से छनती किरण मायावी,
गोधूली में छुपा संसार मायावी,
हर युग में पनपते जीव मायावी,
मंदिर में बिखरी दुआ मायावी,
सजदा करता काफ़िर मायावी,
राज्य में भौंकते कुत्ते मायावी,
फेंकी हुई रोटी के टुकड़े मायावी,
प्रेम से होठों पे कम्पन मायावी,
होठों पे झूलते लफ्ज़ मायावी,
समय का हर एक पल मायावी,
पल में सैकड़ों श्वास मायावी,
तन पे पड़ा कपड़ा मायावी,
नंगेपन में छुपती शर्म मायावी,
भ्रष्टाचार की भूख मायावी,
सच के डंके का शोर मायावी,
आखों के कोने में नींद मायावी,
पलकों पे सिकते ख्वाब मायावी,
श्मशान में जलता मुर्दा मायावी,
जीवन मृत्यु का चक्र मायावी,
मैं मायावी, तू मायावी,
यह सृष्टि, यह ब्रह्मांड मायावी|
Tuesday, December 13, 2011
पंछी...
अलविदा कहते उन पंछियों को आवाज़ लगाती मैं
ले जाओ लिफाफे में बंद मेरी धड़कनें पिया की गली,
कह दो लाल रंग उसके नाम का इंतज़ार करता है ।
ले जाओ लिफाफे में बंद मेरी धड़कनें पिया की गली,
कह दो लाल रंग उसके नाम का इंतज़ार करता है ।
इन पंछियों को अजब सी घिन सिंदूरी लालिमा से,
शायद पंख खून की कीचड़ के धब्बों से सन गए हैं ।
सावन में पतझड़ जैसे मायूस वह अब चहचहाते नहीं,
काले धुंए में पिया का घर धुंधला सा नज़र आता उन्हें
और मैं उम्मीद के दाने छज्जे पर बिखेरते रहती ।
शायद पंख खून की कीचड़ के धब्बों से सन गए हैं ।
सावन में पतझड़ जैसे मायूस वह अब चहचहाते नहीं,
काले धुंए में पिया का घर धुंधला सा नज़र आता उन्हें
और मैं उम्मीद के दाने छज्जे पर बिखेरते रहती ।
Monday, November 28, 2011
प्यासा सावन
पलकों पे गिरती बारिश की बूँदें मुझसे कहतीं,
मेघ की रिमझिम से पहले क्यूँ भीगी है तू,
कुछ चंद मोतियों को अपनी हथेली पर लेकर,
उन बीते हुए लम्हों के आँचल में फंस जाती,
याद है उस बरस भी सावन के झूले पड़े थे,
गीली मिट्टी की ख़ुशबू से महकी थी हवा,
आज भी सावन के झरोखे मुझे घेरे हुए हैं,
पर आज काँटों से भरा है इनका आँचल,
भीग गयी कायनात आज फिर एक बार,
न जाने मेरी रूह क्यूँ रह गयी प्यासी?
Thursday, November 24, 2011
साया

पार्क की बेंच पर बैठी
वो हल्के भूरे गेसू वाली,
सफ़ेद परिधान में
सफ़ेद परिधान में
अपनी ज़ुल्फों को सहलाती,
उस बे-रंग में वह सुंदरी जैसे
कोई भ्रम या छलावा हो,
उस बे-रंग में वह सुंदरी जैसे
कोई भ्रम या छलावा हो,
एक परी जो अपनी लटों में
धूप के मोती पिरो रही हो,
शायद वो गुज़री रात के पलों का
एक छल थी, एक सपना,
जो सांसों की सौदेबाज़ी के बाद
जो सांसों की सौदेबाज़ी के बाद
मुझे नज़र आ रही थी |
आते - जाते लोगों को वह
अपनेपन की नज़र से देखती,
जैसे सब किसी रंगीन कल्पना के पात्र हों,
उसके पंखुड़ी जैसे होठ
जैसे सब किसी रंगीन कल्पना के पात्र हों,
उसके पंखुड़ी जैसे होठ
जीवन का फ़लसफ़ा बोल रहे थे,
एक नीरस सा रंग
एक नीरस सा रंग
उसके होठों से टपक रहा था,
कुछ बेचैन हो के अपने रस्ते का रुख
कुछ बेचैन हो के अपने रस्ते का रुख
मैंने उसकी तरफ मोड़ा
नयनों की आँख मिचौली जब टूटी
सीने में कम्पन उठ आई |
सीने में कम्पन उठ आई |
उसकी काली आँखों में एक खालीपन था
जैसे कोई काला साया हो,
वो साया शायद हंस रहा था
वो साया शायद हंस रहा था
गुज़री रात के उन निरदई पलों को याद कर,
उन सांसों का हिसाब मांग
मेरी रूह को उसने वस्त्रहीन कर दिया था,
गाड़ियों के शीशों पर टिमटिमाती धूप ने
उसका ध्यान मेरी और खींचा,
उसका ध्यान मेरी और खींचा,
समय और जीवन का वो शतरंज का खेल
उसे रोकना पड़ा अचानक |
समय को हराने के ख्याल से शायद
उसने मुझसे उस दिन टाईम पूछा था,
घड़ी की सुईयों का इंसान की सांसों से
घड़ी की सुईयों का इंसान की सांसों से
अजीब सा मेल उस दिन समझा मैंने,
काले साये के समय-चक्रव्यूह में,
निहत्था खड़ा था मैं,
काले साये के समय-चक्रव्यूह में,
निहत्था खड़ा था मैं,
अरसे बाद अपोज़िट सेक्स के बोल ने
एक पत्थर को झंझोड़ दिया था |
उस शब्दावली ने मुझे आखरी जाम
की तरह बेबस कर दिया,
उसके सवाल का उत्तर
मैं अफ़सोस से दे नहीं पाया,
मेरी बदकिस्मती का शिकार
उसके सवाल का उत्तर
मैं अफ़सोस से दे नहीं पाया,
मेरी बदकिस्मती का शिकार
एक बार फिर मेरा सपना बन गया,
चंचल सी हँसते हुए उसने पूछा,
चंचल सी हँसते हुए उसने पूछा,
"आप समय के पाबंद नहीं?"
जीवन-मृत्यु को तराज़ू पर तोलने वाला
समय का इल्म क्या जाने?
जीवन-मृत्यु को तराज़ू पर तोलने वाला
समय का इल्म क्या जाने?
पर आज समय से गुज़ारिश कर,
मन सपनों के टुकड़े समेटने लगा ।
Tuesday, October 18, 2011
शख्सियत
आज फिर है उसके चेहरे पर खुशनुमा मिजाज़
मुद्दत के बाद मिली तकदीर उसे जागीर में,
जमघट से अलग अब नज़र आता है वो,
वक़्त मोहताज अब उसकी कद्रदानी का,
कुतरी हुई तमन्नाएँ भी हैं अब पूरी वफादार,
आर्ज़ू के प्याले गुम हैं खामोश मोशिकी में,
मोहब्बत व नफ़रत के मोती पिरोता वो आँखें मूँद,
कण कण में फैला उसका रुतबा, पर शख्सियत नहीं...
Subscribe to:
Posts (Atom)


















