Monday, March 19, 2012
Sunday, March 18, 2012
रात का आवरण संगम

कोहरे में कंपकपाती रात,
एकांत में दस्तक देती,
स्वयं को खोजती आई,
मेरे दरवाज़े पर सिमटी हुई -
क्लांत भावनाओं से |
श्रृंगार से सुशोभित काली स्त्री,
एकांत में दस्तक देती,
स्वयं को खोजती आई,
मेरे दरवाज़े पर सिमटी हुई -
क्लांत भावनाओं से |
श्रृंगार से सुशोभित काली स्त्री,
अपने स्याहपन के इकहरे आवरण में,
फिर सींचती मेरे शब्दों को,
चाँद पर बिखरी गोधूलि से
और खुरचती प्रत्यय पर फैले ज़हर को|
शायद अपने जैसी वंचित,
मुझे व्यर्थ समझती हुई आई,
ले जाने तारों की छावनी में,
जहाँ इश्वर तैरते हैं,
नींद और स्वप्न की नगरी के संगम पर|
फिर सींचती मेरे शब्दों को,
चाँद पर बिखरी गोधूलि से
और खुरचती प्रत्यय पर फैले ज़हर को|
शायद अपने जैसी वंचित,
मुझे व्यर्थ समझती हुई आई,
ले जाने तारों की छावनी में,
जहाँ इश्वर तैरते हैं,
नींद और स्वप्न की नगरी के संगम पर|
Friday, March 16, 2012
मैं सिर्फ मैं हूँ (चित्र : साल्वाडोर डाली)
मैं सिर्फ 'मैं' हूँ,कोई और क्यूँ नहीं?
लेकिन उससे क्या होगा?
मेरे दिल के ख़ामोश लम्हे -
मेरे जीवन में 'मैं' के उद्देश्य का,
रद्दी भर भी एहसास कर पाएंगे?
मैं सिर्फ पहचान सकती हूँ -
स्वयं की सीमाओं को,
किसी और रूप में ढल भी जाऊँ,
परंतु कैसे भावनाएं समझेंगी -
मेरे अस्तित्व में छुपी,
मान्यता देती 'मैं' की असुरक्षा को ?
मैं, लेती एक निर्णय - 'मैं' नहीं रहती,
फिर देना इस छद्दा रूप को
मेरे व्यक्तित्व के सत्य का परिचय,
अगर मैं हो जाये दफ़न -
इस गलत पहचान के मलबे में,
फिर से क्या मैं की आत्मा -
अपनी परिकल्पना खोज पायेगी?
Monday, March 12, 2012
Friday, March 9, 2012
नीचे खड़ी एक स्त्री
एक दिन भोर होते ही अपने कमरे की खिड़की से बाहर झांक के देखा तो नीचे खड़ी एक स्त्री की आकृति नज़र आई| वो कुछ हाथों के इशारे करती जा रही थी, धूप के कारण वो सब मुझे अलग-अलग आकृतियाँ नज़र आईं| फिर कुछ समय बाद जब रात के सपनों की किरकिरी पानी की छपकियों से साफ़ कर दोबारा उस स्त्री को देखना चाहा, तो हैरानी की बात यह नज़र आई की वो स्त्री मैं ही थी| हुआ यह था की मेरी आत्मा नीचे खड़ी हुई मेरे शरीर को आवाज़ लगा रही थी कि दोस्त नीचे आ जाओ, पैर ज़मीन पे रहेंगे तब ही भ्रम को सत्य बनाने की हिम्मत आएगी|फिर मैं उल्हास और उत्सुकता से भरी तुरंत नीचे जा पहुँची और देखा की उस जगह पर मेरी आत्मा नहीं, एक गाड़ी खड़ी थी और उसके बोनट पे नज़र आई मेरी छवि |
Saturday, March 3, 2012
मैं हूँ तुम्हारी आत्मा
मैं एक आत्मा, एक नन्हा सितारा,
तुम्हारी भौंहों के बीच अपने सिंहासन पर बैठी हूँ |
वहाँ से मैं अपने गंतव्य को स्पष्ट देखती हूँ,
सुनहरे लाल प्रकाश से आगे, विचारों के पंख लगाये उड़ती मैं |
मैं आत्मा आनंद के महासागर से उर्जा की खोज करती,
सभी दिशाओं से आती अध्यात्मिक धाराओं के,
सर्वोच्च स्तर पे खड़ी अपने भीतर को,
आनंद के प्रकाश से स्पंज की तरह भिगो रही हूँ |
मैं तुम्हारी इन्द्रियों के संग बह निकली हूँ भावों में,
सब में एक कामुक संबंध बनाते हुए|
तुम्हारे जीवन का असली उद्देश्य समझती,
अपनी रूचि का प्रतीक देती, मैं हूँ तुम्हारी आत्मा |

Wednesday, February 29, 2012
शब्द ही सम्पूर्ण है
रिश्तों में शब्दहीन अवस्था, काले साये की उदारता में ढले हुए शमशान में पड़े कंकाल की तरह है| एक नीरस सूखापन उन दो या उससे ज्यादा व्यक्तियों के बीच नज़र आता है जहाँ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं होता| शब्द किसी भी रिश्ते में वरदान और अभिशाप दोनों का काम करते हैं, परन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि रूप कुछ भी हो, शब्द ही रिश्तों को उनका अस्तित्व देने वाली कड़ी है| एक उदहारण हम German निर्देशक Fassbinder की फिल्म 'Chinese Roulette' में देखते हैं, जहाँ Angela और उसके माता-पिता के बीच शब्दों की कमी होने की वजह से उनके रिश्ते में वैध कुछ भी नहीं रह जाता| 'Chinese Roulette ' के खेल का तत्व भी शब्द ही है, जिसे बातचीत से वंचित Angela फिल्म के सभी पात्रों का विवरण करने में इस्तमाल करती है|अर्थात शब्द ही सत्य है, जो हर व्यक्ति का समस्त,शुरुआत और अंत है|
Monday, February 27, 2012
धूल हूँ मैं
तुम्हारे कमरे के कोने में चिपकी धूल हूँ मैं,
जिसे तुम्हारे पैर जाने-अनजाने मुसाफिर बना लेते हैं|
लौटने पे तुम्हारी भीगी सी टी-शर्ट की चिपचिपाहट बन,
कई दिनों तक तुम्हारी खुशबू का एहसास करती रहती हूँ|
कभी किसी हवा के झोंके का साथ रहा,
तो मैं धूल तुम्हारे बिस्तर पे जमघट बना लेती हूँ|
इंतज़ार करती की कब तुम नींद में खो,
और मैं चुम्बन बनके तुम्हारे गालों पे चिपक जाऊं|
मैं धूल तुम्हारे नाखुनों में धीट जैसी जमी रहती हूँ,
की जब तुम पहला निवाला लो तो मैं चुपके से,
तुम्हारे शरीर का सफ़र तय करती हुई,
बिना किसी आहट के तुम्हारे दिल में स्थायी हो जाऊं...
Friday, February 24, 2012
विदेशों में भारतीय
मेरे चौबारे से उड़ती गोधूलि -
रंगीन बिन्दुओं से पूछ,
आम की कैरियों की सोंधी खुशबू,
क्या मुझ जैसी कद-काठी वालों को लुभाती है?
मेरे छज्जे पर वक्त-बेवक्त फिरते पक्षियों -
मेरी नींद जैसी असंतुलित धुन में,
शायद मखमल के बिस्तर पर,
पड़े उन छोटे लोगों से पूछ,
कैसी है मिठास वहां लोरियों की?
मेरे लहराते खेतों से चुने हुए दाने -
वहां मेरे रंग में ढले,
दिल के करीब किसी अजनबी से पूछ,
क्या वहां के चूल्हे पर सिकती रोटी से,
टपकती वो ही पुरानी उसकी लार?
Tuesday, February 21, 2012
आकर्षण की मृगतृष्णा...
जीवन में जो हम स्पष्ट आँखों से देख सकते हैं, वो ही सत्य नहीं होता, अधिकतर नज़ारे मस्तिष्क दवारा उत्पन्न किये गए मृगतृष्णा होते हैं, जिनके लोभ में इन्सान भावात्मक हो उठता है|हमारी पाँच इन्द्रियाँ मोहित हो कर एक ऐसी मनोकामना को जन्म देती हैं जो सच्चाई से अलग, अकल्पनीय पूर्ति की दिशा में सभी करनी व कथनी को मोड़ देती है|किसी घुड़सवार जैसे यह मनोकामना मनुष्य के विचारों से उत्पन उर्जा युक्ति को काबू कर, मायावी रूप से सुशोभित कर देती है|
"सब चमकती हुई चीज़ें सोना नहीं होती", परन्तु फिर भी हम इस चमक के लोभ में निहत्थे और बेबस हो कर बंदी बन जाते हैं, और एक खिचाव सा भावनाओं पे महसूस होता है, सत्य और भ्रम को न परख पाने की विवशता ही शायद इन्सान को कितनी बार निष्क्रिय स्तिथि में डाल देती है|ऐसी अवस्था में एक अयोग्य इन्सान, अपनी दूषित प्रज्ञा से प्रभावित, स्वयं के ज़मीर से विपरीत कार्य को ही सत्य और अनुशासित बताने के अलग अलग तर्क बनाता है |इसी नकारत्मकता से उत्पन धुंए से इन्सान भ्रमित होकर,मुखौटा पहन अपने ही अस्तित्व की तलाश सम्पूर्ण जीवन करता रहता है|
Wednesday, February 15, 2012
मैं
आग में भभकते पतझड़ के पत्तों की राख मैं,
बहा दो मुझे बनारस में बहती गंगा के तट पे,
की बहती धाराएँ मुझे डाल दें उन वादियों में,
जहाँ कीचड़ में खिलता जंगली फूल बन जाऊं,
जिसे कोई रमता जोगी तोड़कर झोली में डाल,
किसी मंदिर की चौखट पे अर्चना में चढ़ा दे,
फिर किसी पुजारी के हाथों से प्रसाद में मिलके
किसी गरीब की प्रार्थना का नतीजा बन जाऊं,
और जब वो मुझे अपनी चौखट का गर्व बना ले,
तो मैं फिर से मुझसे बिछड़ी हुई बसंत ऋतु में,
अपनी खुशबू फेलाके सुकून से बहती चलूँ |
Monday, February 13, 2012
ख्वाब
ख्वाब पुर-असरार फिरते पंछियों का रेहनुमा आवारा,
उनके परों पे बैठ मेरे दिल का आहंग लेके आया,
बहारों से मुकरर होता तकदीर-ए-फल्सबा का ग़ुलाम,
वाज़-ए-बू बनके रह जाता मेरी उम्मीद में आके पैदार,
फिर नूम तावाज़ा होती मेरी रूह इसके जादू में बहबूद,
गुमनाम दस्तक देती रहती इसकी मिठास को माज़ी,
आहिस्ता मेरे रक्त के गलीचे का शबनम बन जाता,
बेखुब चुप्पी साधे सुबह की आयातों से रूबरू होता हुआ,
खालिद मुझसे पूछता "मेरी मंज़िलों की कौम क्या है?"
सपना
विशाल आकाश की बाहों में डूबी तारों की छावनी,
उसमें शान से अस्तित्व की मोहर लगाता हुआ,
जैसे कोई स्थिर आध्यात्मिक जीव अप्रभावित ,
शायद वो गंगा के सुखद तट पे पुकारती रात में,
अपने पलों को इकठ्ठा करने निकल पड़ा है,
बूँद-बूँद समेटता हुआ किसी महासागर जैसा,
पलकों के कोने में आकर बेठ जायेगा यह घुस्पेटिया |
Wednesday, February 8, 2012
"कुछ चुभता हुआ सा..."
डर को निकालने के लिए उसकी जड़ तक पहुचना ज़रूरी है, कैसे और कहाँ से आता है यह डर?क्या समाज डर उत्पन करता है, पर हम सब से ही तो यह समाज बना है, परन्तु फिर भी हम डर को नहीं मार पाते|समाज में स्वीकृति पाने के बाद भी कहीं कुछ फाँस जैसा दिल में चुभता , यह था डर, वो ही डर जो समाज ने मन में पैदा किया| पर समाज नहीं तो डर नहीं?, काश ऐसा कहना आसान होता, परन्तु डर जीवन-मृत्यु की चक्र के साथ रोम-रोम में किसी बिन बुलाये मेहमान की तरह घर करे बैठ जाता है...तो डर का बीज, सिचाई और उपज इन्सान के मन की ही देन हुई, इसलिए आज कल महसूस होता है कुछ "चुभता हुआ सा..."|
"डर हैवान सा खराश करता हुआ
जिंदा रखे मेरी रूह को ...|"
Monday, February 6, 2012
रात...
कोहरे में कंपकपाती रात, दस्तक देती मेरे दरवाज़े पे रात,
चाँद से मुह फेर अपने ही कालेपन के श्रृंगार से सुशोभित,
एक लोटा चांदनी के बदले सियाह्पन का राज़ खोलने आई
यह रात कहीं बिछड़ गयी थी अपने तारों की छावनी से,
टूटते तारे के इंतज़ार में तमन्नाओं की गठरी लिए बेठी थी|
मैंने कहा तू क्या करेगी अपनी हद का फल्सबा मुझे सुनाके
आखों में पड़ी किरकिरी के साथ उसे भी सुबह भूल जाउंगी,
अँधेरे पे गर्व करती रहस्मय ढंग से मुझ पे हंसी वो कमीनी
और बोली "लाल है मेरा चाँद निहत्था खड़ा काले धुंए में"
कोहरे में कंपकपाती रात दस्तक देती मेरे दरवाज़े पे रात|
चाँद से मुह फेर अपने ही कालेपन के श्रृंगार से सुशोभित,
एक लोटा चांदनी के बदले सियाह्पन का राज़ खोलने आई
यह रात कहीं बिछड़ गयी थी अपने तारों की छावनी से,
टूटते तारे के इंतज़ार में तमन्नाओं की गठरी लिए बेठी थी|
मैंने कहा तू क्या करेगी अपनी हद का फल्सबा मुझे सुनाके
आखों में पड़ी किरकिरी के साथ उसे भी सुबह भूल जाउंगी,
अँधेरे पे गर्व करती रहस्मय ढंग से मुझ पे हंसी वो कमीनी
और बोली "लाल है मेरा चाँद निहत्था खड़ा काले धुंए में"
कोहरे में कंपकपाती रात दस्तक देती मेरे दरवाज़े पे रात|
Tuesday, January 31, 2012
नन्ही स्त्रियों की रहस्मय कामुकता(sexuality)...reading Lolita...
क्या हम नन्ही स्त्री की कामुकता का अनुमान साधारण व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और भावप्रधान तत्वों के अनुसार लगा सकते हैं?नन्ही कोमल स्त्रियों के लिए sexual desires जैसे शब्द पुरे महत्व और संजीदगी के साथ कहे जा सकते हैं?क्या लोगों का और इन तितलियों का अवलोकन इन शब्दों के प्रति एक सामान गलती से भी होता होगा?स्त्री जाती में hormonal growth कुछ 12-13 वर्ष की आयु से आरम्भ हो जाती हैं, जब उन्हें उनके गुप्ताँग और उनसे जुड़े स्पर्शज्ञान का एहसास होता है| इसी समय वो एक बालिका और स्त्री के बीच के मझदार में अपने आप को फंसा और शायद निहत्था महसूस करती होगी| सोचने की बात यह है की इस नन्ही स्त्री के मन में आकर्षण किस प्रकार का उत्पन्न होता है? क्या उस डर और झिझक के भीतर दबी हुई राइ के दानों जैसी शारीरिक ज़रूरतें अपनी चरण सीमा तक पहुँच पाती होंगी?इसी पेचीदा सवाल का जवाब ढूंढ़ते हुए वो teenage के मध्यम स्तर तक पहुँच जाती है जो की 15-17 वर्ष की आयु होती है| इस समय उसके मन का संकोच और शारीर का बेढोल रहना भी कम होने लगता है, इसका सबसे उप्रयुक्त और सहमत उत्तर hormonal changes की गतिविदियों में स्थिरता आना है|यह बात की शायद वो अपनी शारीरिक ज़रूरत को धीरे धीरे समझ रही है किसी सभ्य व्यक्ति के सोच से बहार क्यूँ है? उसका नीरस बेरंग सा रहना या बगावत करना शायद उसकी यौन इच्छाओं से उत्पन हुआ भावात्मक विस्फोट होगा|उससे उम्र और कद में ज्यादा सयाने लोग उसकी इस प्रकार की नाजायज़ सी ज़रूरत को शायद उसका बचपना समझ कर टाल देते हैं या फिर डांट फटकार मारकर उसे स्वयं अपनी ही कामुकता के भंवर में गोते लगाती हुई छोड़ देते हैं|मासूमियत का धागा चंचलता के मोतियों में से गुज़रते हुए उसे पूरी स्त्री में कब परिवर्तित कर देता है उसे वो और उसके आस-पास के लोग भी नहीं समझ पाते| प्रेम और वासना के बीच खिंची रेखा का तात्पर्य हर स्त्री के नज़रिए से उसके teenage के अनुसार भिन्न भिन्न कल्पना शक्ति में परिवर्तित हो जाता है|अंत में प्रशन यह उठता है की क्या वो नवजात स्त्री, शारीरिक और मानसिक दोनों सन्दर्भ में, अपने यौन सम्बंधित जूनून को सही ढंग से समझ पाती है या नहीं?...
Sunday, January 29, 2012
शोक...
मैं नहीं जानती की शोक के समय सहानुभूति के कौन से शब्द पीड़ित को बोले जाते हैं,यह इसलिए नहीं की मेरा यह मानना है की आत्मा मृत्युंजय है और कुछ समय बाद उस गुज़रे हुए व्यक्ति का पुनः किसी अन्य रूप में आगमन होगा,परन्तु सत्य यह है की मैं शोक सभा में प्रस्तुत जनों की दुख़ की सीमा को भांप नहीं पाती,यदि कोशिश करती हूँ तो मन में सवाल उठता है की जब उनका उस मृत व्यक्ति के जीवन में पहला दिन हुआ होगा तो उन दोनों की मानसिक और शारीरिक स्तिथि कैसी होगी?
क्या अपने प्रेम और हर्ष की सीमा को वो लाँघ पाए होंगे या फिर उनका रिश्ता समय और संसार की बढती गतिविदियों के साथ कुछ धुंधला सा हो गया होगा?ऐसी किसी बेढंगी सी सोच में पड़ कर मैं उस शोक ग्रस्त व्यक्ति के अंतर्मन को टटोलने की कोशिश न करके उस पल एकाएक जो शब्द मुह से निकलते उन्हें ही उप्रीत समझ अपनी प्रस्तुति का सबूत जैसी उसे दे देती|उस मृत सफ़ेद चद्दर में लिपटे इन्सान के भावों का एहसास मुझे ज्ञात नहीं हो सकता,शायद होता तो कोशिश करती की बाकियों जैसी मेरी आँखें भी नम हो जाएँ|तब तक मृत्यु के समय भावों के एहसास को मुझे समझने की शायद ज़रूरत नहीं या फिर किसी करीबी के गुज़र जाने का इंतज़ार करूँ|
Tuesday, January 24, 2012
दाह-संस्कार
झंकार उठती है समय के गुमशुदा अंतराल में,
जगाता कोई अपने अस्तित्व में डूबे तेरी नींद को,
एक आवाज़, कर रिवाज़ों को नरक दंड में स्वाहा,
संकोच त्याग, पकड़ अरमानों की पगडंडियों को,
शैतानी रूप ले मेरे मन और लगा ठहाके संसार पे,
जगा जो तू आज,क़त्ल न होने दे तेरी अनकही का,
हिंसक कर सहमी सोच,चाहें नाजायज़ उसकी राह,
जो न हो जुनून, हर पल कर खुद का दाह संस्कार...
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