Sunday, June 10, 2012

गीत - रात कजरारी (चित्र : मीराबाई)




रात कजरारी मोरे नैनं में तू यूँ छुप जाना,
की फिर ना करे बेईमानी मोसे तोरा चंदा - (२)

तारों की डोली में जब मैं पिया घर जाऊँ
तू चाँदनी के पथ से मृदुंग बजाते आना,
फिर तेरी आभा से सजी मोरी बिछिया
खेले पिया संग सेज पर आँख मिचोली,
और होले से पनघट पे सखियों से कहना
मृग रसिया चंदा ने नाज़ुक कलइयां मरोड़ी

रात कजरारी मोरे नैनं में तू यूँ छुप जाना,
की फिर ना करे बेईमानी मोसे तोहरा चंदा - (२)

फिर ना करूँ मैं नटखट बरजोरी तोसे
की तेरी मीठी ओढनी में सोया मोरा चंदा,
श्याम रूप धारी तू भोर की किरणों संग
चुपके से पग पग मोहरे अंगना में आना,
और मेरे केसुओं में मोगरे की गंध से
सजा देना पिया संग मोरी बत्तियाँ,

रात कजरारी मोरे नैनं में तू यूँ छुप जाना,
की फिर ना करे बेईमानी मोसे तोरा चंदा - (२)

Friday, June 8, 2012

गम के तरन्नुम में ख़ुशी




(तसवीर : अमृता शेरगिल)


आ  ख़ुशी  तुझे  अपने  गम  के  तरन्नुम  में  छुपा  लूँ,

तू  जो  बढ़ा  ले  चुपके से एक  कदम  मेरे  गुलफाम  में
अपनी  ख्वाइशों  की  बस्ती  तेरी खुशबू से सजा  दूँ,

यूँ  तो  वक़्त  का  मोहताज  है  तेरा  हर अफसाना 
बस  यूँ  ही  तेरी  मोसिकी  में  चंद अल्फाज़  लिख डालूँ,

आ  ख़ुशी  तुझे  अपने  गम  के  तरन्नुम  में  छुपा  लूँ,

बादलों पर चलके आयेगी जब मिलने तू हर सहेर
तेरी बारिश में भीग के अपने आँसुओं में तुझे बसा लूँ,

तू अगर तमाशा बनके नाचे मेरी तमाम हसरतों पर
इन तमाशों की वफ़ा में हर किरदार मैं हंस के निभा लूँ,

आ  ख़ुशी  तुझे  अपने  गम  के  तरन्नुम  में  छुपा  लूँ...




Wednesday, June 6, 2012

एक ग़ज़ल - मेरी हसरतें









लोगों ने जो लगाई मेरी हसरतों की राह में आग,
खून का हर कतरा आँखों में तपिश बनके बस गया,


गुज़ारिश थी अंजुमन से सिर्फ चंद सांसों के सुकून की,
पर तामीर ओढ़े कमबख्त ज़माना मेरी रूह को ही डस गया,

कहते हैं लोग तारों की आर्ज़ू कर इतनी की धूल तो मिल जाये,
पर घर के अंधेरों से घबरा कर मेरा साया रात में कहीं फँस गया,

कहाँ है वो जन्नत जहाँ होता है दुआओं का जलसा देर सवेर,
यहाँ मेरी ही इबादतों का फन्दा मेरे अरमानों पर कस गया,

हज़रत की शबनम में मैंने भी खिलाया गुल होके बेनज़ीर,
पर शगुफ्ता में उसकी मेरे ही अश्कों का रस गया...






Tuesday, June 5, 2012

दैनिक जनवाणी (रविवाणी) में उदय प्रकाश जी पर प्रकाशित मेरी समीक्षा


दैनिक जनवाणी की रविवार पत्रिका (रविवाणी) में उदय प्रकाश जी पर मेरी एक समीक्षा प्रकाशित हुई है

शीर्षक - भीतर के अन्तर्द्वन्द्व से बाहरी समझौता
सन्दर्भ - उदय प्रकाश जी की कृति पॉल गोमरा का स्कूटर
दिनाक - 3rd June 2012


Sunday, June 3, 2012

एक बे(नाम) ग़ज़ल




   ज़माने के रिवाज़ों ने मारे मुझ काफ़िर को ताने               

कुछ ऐसे वक़्त में तप के बने मेरे अफसाने,


होठों की पपड़ी बनके रह गए मेरे सब अल्फाज़ 
अब सिर्फ आँखों से बहती है रूह होके गुम्साज़,


शौकिया गम में भी उड़ाते चले हम हंसी के बुलबुले 
हमारी ही बेबसी में आये लोग लेके अपने सिलसिले ,


लोगों जला दो मेरी मल्कियत के दिए अपने बाज़ार 
इस ज़िल्लत से फिर भी रोशन मेरी उमीदों की मज़हार,


कारवां-ए-ज़िन्दगी पे नाज़ करता अब हाथों का जाम
आईने से रूबरू होता अजनबी पूछे उस अक्स से मेरा नाम...


Tuesday, May 29, 2012

2 मई 2012 को दैनिक जनवाणी में प्रकाशित मेरा लेख - 'चटपटी नज़र का बेस्वाद भारत'



कल कई सालों बाद अपने शहर मेरठ के दर्शन करने का एक अप्रत्याशित परंतु सुखद अवसर मिला था| सुबह से आबू लेन की चाट का चटपटा और नमकीन ज़ायेका मुंह में भूख के फुव्वारे चोढ़ते हुए पेट के गुम्बज में तीव्रता से चक्कर लगा रहा था | बहुत आशावान और उत्तेजित होकर शाम करीब 6-6:30 बजे निकल  गयी थी अपने उसी पुराने चटोरेपन के अड्डे पे, मेरी घड़ी शायद समय से पहले चल रही थी परंतु उस उत्सुकता और बचपन के मधुर विषाद के आनंद ने मुझे वहाँ उन चाट वालों से भी पहले पहुँचा दिया था | इंतज़ार एक ख़ुशी का अनुभव होता है ये बात सोच के ही मैं बड़ी बेसब्री से उन चाट वालों का इंतज़ार कर रही थी | ना जाने क्या जादू सा उनके हाथों में होता है कि जैसे भ्रमांड के सभी स्वाद उस पापड़ी चाट या आलू टिक्की चाट में ख़ुशी से समा जाते हैं | करीब आधा घंटा बीत गया और कोई हरकत शुरू नहीं हुई थी और ना ही कहीं दूर से मुझे कोई चाट वाला अपनी रेड़ी लाते हुए दिखाई पड़ रहा था | थोड़ा संशय में पड़कर मैंने आस-पास के लोगों से उन चाट वालों के बारे में पूछना शुरू किया, इस जवाब की उम्मीद के साथ कि चाट वालों के इस दैनिक काम का समय और स्थान बदल चूका है | कई लोग बिना कुछ कहे या भद्दी सी शकल बनाते हुए बिना कुछ कहे वहां से चले गए | कई लोग मेरे इस प्रशन पर धीमी पर प्रमुख अठ्हास कि आवाज़ निकालने लगे जैसे मैंने किसी काल्पनिक वास्तु या विलुप्त जीव के बारे में पूछ लिया हो | आखिर में एक सज्जन ने मेरी बेबसी को भांपते हुए मुझे स्पष्ट शब्दों में बताया कि काफी समय से अब वहाँ कोई चाट वाला नहीं खड़ा होता, दरसल किसी उच्च प्रोफाइल वाले जनता के सेवक ने ही उन्हें वहाँ से हट जाने का आदेश दिया था | बस जैसे ही यह शब्द कानो पे पड़े मुह सिकोड़ गया और पेट का गुमबज गुस्से में अजीब सी आवाजें निकलने लगा | अपने अतीत में वापस जाके फिर से अपने बचपन को जीने कि इच्छा जागृत होने लगी, जिसके द्वारा मैं अपनी युवा अवस्था में आने पर, मेरे चाट जैसे विभिन्न स्वादों और आकृतियों वाले शहर को इस क्रूरता से बदल देने वालों का विरोध कर सकूँ |



पर वो कहते हैं ना कि वास्तविकता कल्पना से अधिक विचित्र होती है, इस कारण से मुझे अपना यह मुर्खता से पूर्ण ख्याल उन चाट वालों के कल्पित और गोपनीय स्वाद में दबाना पड़ा | आज अपनी इस अधूरी इच्छा से भी ज्यादा दुख, ग्लानी और आश्चर्य मुझे मेरे देश में होने वाले व्यर्थ के बदलावों पे हो रहा है | ऐसा लग रहा है जैसे मेरा देश नहीं कोई मिट्टी और लकड़ी से बना बेजुबान पुतला हो जिसे हर बार लोग अपनी सुविधा के अनुसार बदलते रहते हैं और भूल जाते हैं इस धरती में उगते सच्चे तत्व और अतुल्निय गुण | जहाँ देखो बदलाव ही नज़र आ रहा है कभी चीज़ों के रूप में नहीं तो कभी इंसानों के रूप में | पुरानी चीज़ों का या तो नामोनिशान मिटा दिया गया है या फिर उन्हें नया रूप देकर और नयी पैकिंग में डाल के पूंजीवादी अर्थव्यस्था का सुविधाजनक और फ़र्ज़ी हिस्सा बना दिया जाता है | "परिवर्तन अनिवार्य है" ये बात सौ प्रतिशत उतनी ही सत्य है जितना कि वो बिछड़े हुए चाट के ठेले परन्तु यह परिवर्तन अफ़सोस से कुछ वर्गों एवं स्थानों तक ही सिमित रह कर अन्य सभी को रेगिस्तान में पड़े कंकाल कि तरह विकास और वृद्धि से वंचित और सूखा छोड़ जाता है | भूमंडलीकरण और नवीनता अवश्य हमारे देश को विकासशील देश से विकसित देश कि तरफ बढ़ाते हुए प्रगतिशील बनाने में पूरा योगदान दे रहे हैं | इसका विभाजन करने पे जो 'भू' और 'मण्डली' शब्द निकलते हैं उसमें क्या उतनी ही क्रम्किता है, जितना कि हमारे देश के बाहरी चित्र पर नयी पैकिंग में पुरानी मिठाई के रूप में नज़र आती है ?

दोहरी आमदनी और तेज़ी से जीवन व्यतीत करने वाली नयी पीड़ी तो शायद चीज़ों का असली और नस्लीय मूल ज्ञात ही नहीं होगा और गैस चूल्हे पर सिकती रोटी का स्वाद रेडीमेड भोजन के प्लास्टिक की गंध में खो गया है | भूक मात्र एक कैप्सूल में परिवर्तित होती जा रही है, एक परमाणु बोम्ब की तरह लम्बे समय तक विस्फोटक रहने वाला कैप्सूल | रोटी, कपड़ा और मकान केवल गरीब वर्ग का नारा है पर यह छोटे और पिछड़े लोगों का अस्तित्व गैर और महत्वहीन बनके, एक मृगतृष्णा ही रह गया है |

नवोन्नत वर्ग की इस विनिर्देश से बचने का प्रयास करते हुए शायद मैं अपने पुराने महत्वकान्षाओं से परिपूर्ण (‘हम होंगे कामयाब’ गीत की सच्चाई वाले)भारत के दर्शन सिर्फ कहानियों और कविताओं में ही कर पाऊँगी | रही बात चाट के चटकारों की, वो तो अब बचपन के दिनों की यादों वाली सुरंग में, अनैच्छिक या समय की पाबंदियां हटने पर स्वैच्छिक तरीके से, भटकने पर ही मिल पाएंगे |

Monday, May 28, 2012

हो री पतंग (गीत)


हो री पतंग बादलों के बीच तू लहरा कुछ ऐसे,    
उनके होठों की आधी चांदनी फैली हो जैसे 

धुप के मोती उनके आँगन में डालके तू पतंग
कहना वक़्त भी अपनी राह में खोजे उनका संग
अपनी उँगलियों में कस लूँगी इस कदर तेरी डोर 
की वापस लेके आएगी तू उनकी बातों की भोर 

हो री पतंग बादलों के बीच तू लहरा कुछ ऐसे,
उनके होठों की आधी चांदनी फैली हो जैसे 

आँखों की ओस से लिख दूँ तेरे कागज़ पे कुछ बात
छत पे जाके देख कैसे करें वो तारों में मुझसे मुलाकात
बारिश की बूंदों से अगर हो जाये कुछ मद्धम तेरा रुख,
उनके तकिये से कहना इंतज़ार में बेठी बाँटने सुख-दुख

हो री पतंग बादलों के बीच तू लहरा कुछ ऐसे,
उनके होठों की आधी चांदनी फैली हो जैसे

Thursday, May 24, 2012

बचपन का झिलमिल गुब्बारा

 (तस्वीर : अल्बर्ट लामोरिस्से की फिल्म 'दा रेड बलून' से)


ओ बचपन, ओ बचपन, 

उड़ जा तू गुब्बारा बनके,            
बचते बचाते सपने में,
जंगल की तीखी शाखाओं से,
न खरोंच दे तेरी अबोधता को,
अपने दुष्ट प्रयोजनों से घायल करके ।

कुचते हाथों से अपने गुब्बारे को सैर करा,
सूरज की किरणों के तिलिस्म में,
मुट्ठी में बांध कर झिलमिल चितियाँ,
लौटा दे मेरे आँखों की वो मीठी निंदिया
भेज कर बुलबुल की सुन्हेरी आवाज़ में ।

Saturday, May 19, 2012

वृद्धावस्था (तस्वीर : फिल्म नोटबुक)






वृद्धावस्था में लेते हुए चाय की चुस्कियाँ

हम समय सुरंग के सम्मोहन में होंगे लुप्त,
और विषाद के पलों का स्मरण करते हुए
हमारे हाथ चुम्बक जैसे समामेलित हो जायेंगे,
जीवन वास्तविक में चाहें हो एक अंतहीन गुम्बज, 
सत्य रहेगा सिर्फ वृद्धावस्था में इसका प्रेम अनुग्रह, 
जब नज़र आएगा विकसित होता हमारा स्वप्न लोक, 
हमारा प्रेम सदाबहार के रूप में अक्षत हो जायेगा |

Thursday, May 10, 2012

प्रिय तुम्हारी प्रेम वाणी




(अमृता शेरगिल का आत्म चित्र)


कई वर्ष पश्चात्,                      
जब मेरा शरीर - सम्मिलित होगा,
धूल और व्यर्थ में,
तुम्हारी प्रेम वाणी - फिर से,
मंद ध्वनि में,

मुझे सम्मोहित कर देगी...
                               

Wednesday, May 9, 2012

मृत्यु - स्वयं पद प्रदर्शक !



(चित्र: फ्रीडा काहलो - मेरी मनपसंद चित्रकारों में से)  




पुन: मृत्यु प्रतीक्षा में,
एकमात्र खोज करती - स्वयं,
जीवन अस्तित्व में स्थिर 
आगमन वास्तविकता का - 
पद प्रदर्शक का रूप धारण किये | 


मृत्यु अपने प्रयोजन की - 
खामोश मार्ग दर्शक बन,
मेरे भीतर अपनी दराँती की चमक,
प्रकाशित करती - बनके विश्वात्मा |


परन्तु ये अटल प्रेत - अपरिचित,
समय के मोनोक्रोम से,
जो है संभवतः - मेरा भाग्यविधाता,
और मृत्यु की प्राणहर झंकार,
गुंजायमान - जीवन प्रक्रिया के परिमाण पर |















Sunday, May 6, 2012

स्वैछिकता में अस्पष्ट मनोकामनाएं ! (चित्र : अमृता शेरगिल)



जीवन अनोखी में मेरा पुनर्जागरण,
समय स्मरण में अवरुद्ध,
विषाद केंद्र में स्थिर -
यादों की लौपतगामिनी,
और एकांत कारावास में गुप्त -
अस्पष्ट मनोकामनाएं |
भावनाओं की करुण रिक्तता से,
फर्जी आधुनिकरण के प्रति -
स्वैछिकता के जराग्रस्त में
स्व-अनैच्छिक - मेरा मूर्त जीवन



Thursday, May 3, 2012

शुन्यता स्वप्न की ! (चित्र: जोसे रूज़वेल्ट)




मेरी आँखों का आधिक्य,   
दूरस्थ परिधि दृष्टि में -
जीवित स्वप्न,
अक्सर बनते अवरोधक,
मेरे पर्यटक राग के
और मैं अवचेतन में घिरी,
स्वयं - संभवतः वास्तविक,
उत्कीर्ण करती मेरे अद्धुत को,
शुन्यता के मोहभंग में |

Sunday, April 29, 2012

रक्त वाहिकाओं में प्रेम चक्रवात


प्रेम के विचित्र समामेलन ने,  
तिलस्मी चुम्बक जैसे,
तुन्हारे अनंत स्नेह की दासी -
अविनाशी बंधक,
इस चक्रवात का बना लिया मुझे |

ये सुखद आश्चर्यों का संयोजन,
प्रज्वलित करता मेरी प्रतिभाओं को,
और एक मीठी स्मृति -
प्रशंसक बन ,
स्थायी निर्मित है,
अब मेरी रक्त वाहिकाओं में |

Tuesday, April 24, 2012

भ्रष्टाचार का मलबा



रोज़ की दिनचर्या की यात्रा के समय जब भी मेरी नज़र स्थानीय रेलवे स्टेशन या बस स्टॉप पर बेचे जाने वाले अख़बार या पत्रिकाओं पे पड़ती है उसमें एक प्रमुख खबर मेरा ध्यान चुम्बक की तरह अपनी तरफ आकर्षित कर लेती है | चोर नज़र से बिना उस खबर की खरीदारी किये जब उसे पढने की कोशिश करती हूँ तो नज़र सबसे पहले एक साधारण कद - काटी वाले एक वृद्ध मनुष्य पर पड़ती है, लोग इन्हें देश विदेश में "लोकपाल विधायक - अन्ना हजारे" के नाम से जानते हैं|गांधीवादी गुण के साथ अन्ना हज़ारे को संदर्भित किया जाता है, समाज से भ्रष्टाचार की गंदगी के उन्मूलन के लिए युद्ध स्तर पर इन देवता पुरुष ने अपनी कमर कसी हुई है| परन्तु न जाने क्यूँ उनकी इस आकांक्षी समाज की तस्वीर मन में न जाने एक बेचैनी, एक अल्हड़पन सा महसूस कराने लगती हैं शरीर में, जैसे ये सब एक मृगतृष्णा है या फिर एक ब्लैक होल| 

अन्ना जी और उनके नेक काम के प्रति पूरे सम्मान के साथ, सकारात्मक हूँ परंतु यह भ्रष्टाचार का गोबर यदि सीमेंट के सामान मज़बूत रूप ले कर हमारे दिल, दिमाग और आत्मा में घुस्पेटिया बनके बैठ जाये, तो इस परेशानी का निवारण कैसे किया जाये? हर सामान्य एवं असामान्य व्यक्ति जो अपनी जीवन शैली की सीमाओं में तल्लीन है और जिसका अस्तित्व ही शायद इस भ्रष्टाचार में घुल मिल गया है, वो इसके दुष्कर्म का आभास किस प्रकार से कर पायेगा, यह मेरी प्राकृतिक समझ के बाहर है|

इडियट बॉक्स यानि टेलेविज़न पे चैनल बदलते वक़्त अकसर नज़र जनता जनार्दन के किसी दूत की बुलंद आवाज़ की तरफ खींची चली जाती है, जो की अपनी आवाज़ के शीर्ष पर चीख कर यह बताने की कोशिश कर रहा होता है कि "लोकपाल बिल जल्द ही पारित हो जायेगा और आज़ादी के संघर्ष का दूसरा आन्दोलन भारतीय संविधान में चिह्नित किया जायेगा|" अगर इस कथनी अथवा करनी के सफल समापन में ज़रा भी सच्चाई है तो मैं पूरे देश को बधाई देना चाहूँगी परंतु एक सवाल जो मैं सबके समक्ष प्रस्तुत करना चाहती हूँ, वो यह कि "क्या ये विधेयक हमारे देश को डीमक कि तरह कुतरती बुराइयों की कमी को सुनिश्चित कर पायेगा?"

भ्रष्टाचार के बारे में लोगों की आम राये अवैधानिक ढंग से अपना वैध काम कराने के लिए पैसा देना है|जिसकी असहमति और शायद परिस्तिथि के अनुसार सहमति पे, टिपण्णी देने वाले अनेकों सज्जन हमारे देश में रहते हैं|लेकिन वो अन्य मुद्दे जो असलियत में एकत्रित होके इस बड़े कूड़े के ढेर, यानि भ्रष्टाचार को इजाद करते हैं, उनकी तो यह महारथी अपेक्षा ही कर देते हैं| उदहारण के लिए, ऑटोरिक्शा में बैठ के अपने गंतव्य तक जाने के लिए कई बार आपको वैध किराया देना पड़ता है, पर आप इस दबंग बाज़ी के आगे निहत्थे हैं क्यूंकि आपके दिमाग में उस समय सबसे महत्वपूर्ण बात ये चल रही होती है कि किस प्रकार शीघ्र अपना कार्य शुरू करें|इस कारण वश आप बिना अपनी मानसिक शांति के साथ समझोता किये बिना वो चंद Rs.4 से Rs.5 भी देना वैध समझते हैं| तो अगर भ्रष्टाचार कि सामान्य परिभाषा को माने तो यह उदहारण एक दम सटीक बेठता है और ऐसे ही छोटे छोटे वास्तविक जीवन के उदहारण मिलके भ्रष्टाचार के द्वारा देश को खोखला बनाते हैं|ऐसे ही अगर आप किसी नए शहर में जाते हैं वहां कि भाषा, स्थानों और नियमों के प्रति आप अनजान और अनभिज्ञ महसूस करते हैं और अपने ही देश में आप पे विदेशी कि मोहर लगा दी जाती है| आपको इस नज़र से देखा जाता है जैसे आप किसी दुसरे गृह से पृथ्वी लोक पे आये हैं, शायद इस तुलना में भी राकेश रोशन जी कि फिल्म में अजनबी जीव 'जादू' को ज्यादा सम्मान से संबोधित किया जायेगा, यदि वो पृथ्वी पे सत्य में प्रकट हो जाता है|यदि आप अपने लिए कुछ बुनियादी सामान खरीदने जाते हैं, जैसे फल -सब्जी या राशन तो आप का किसी तिलस्मी माइक्रोस्कोप से मुआइना करते हुए दुकानदार आपके विदेशी होने को भांप लेता है और अचानक आपके लिए सभी दाम उच्च स्तर पे पहुँच जाते हैं और हिम्मत करके पूछने कि चेष्टा भी करें आप तो जवाब तुरंत मिलता है वो ये कि "यहाँ हर जगह ये ही दाम है"| आप असहाय और मजबूर हैं, आप एक - दो जगह और कोशिश करते हैं पर निराशा वश आपको अवैध पैसों को दे कर अपनी जीवन की गाड़ी को चलने के लिए वैध सामान खरीदना पड़ता है|

बाकि अन्य छोटे परंतु मुख्य मुद्दों का सूचीकरण देना अनिवार्य नहीं क्यूंकि तथ्य ये है कि इन पर बात या टिपण्णी करना भी व्यर्थ है| असल मैं ज़रूरत है इन भ्रष्टाचार के उपाख्यानों के प्रति एक ठोस समाधान निकालने की, क्यूंकि क्रिया में शब्दों की तुलना में अधिक बल होता है| व्यक्तिगत रूप से मैं ये ही कहना चाहूँगी की खाते-पीते, सोते-जागते मैं स्वयं को इस भ्रष्टाचार के गू में फंसा महसूस करती हूँ और अगर स्वयं मल पारित क्रिया की तरह इससे भी छुटकारा पाने का प्रयास करूँ तो अचानक कब्ज़ से पीड़ित होने का एहसास सा दिमाग और आत्मा में होने लगता है|

Monday, April 23, 2012

स्कूल बैग

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ



सूर्य के शिखर से पहले,

रोज़ नन्हे कदम टुक-टुक गुनगुनाते,

खिलखिलाते स्कूल बैग को देखने,

वो परियों की कहानी का पिटारा,

तरसती बुनियाद उसकी - लत्ता सी वो,

नाजायज़ सी उम्मीद मुट्ठी में बंद,

जायज़ मुस्कान के पीछे छुपी लौट जाती |



टिमटिमाती आँखें - कठबोली में,

"माँ सममित कपड़े मैं क्यूँ नहीं पहन पाती?"

पसंद को तुम्हारी ज़रूरत नहीं,

माँ विषय बदल देती - अट्टहास में,

पर शब्द तो सुइंयाँ चुभा देते,

स्तब्धता को हंसी में बसा लेते | 




Monday, April 16, 2012

अपरिचित - किस छोर पे?





जिस दिन मैं रवाना होंगी,               
विदेशी भूमियों के लिए - 
दूरस्थ, अनजान भूमियाँ,
यात्रा कि शुरुआत से पहले,
पूछूंगी - हवा, सफ़ेद बादलों से,
भविष्य कि धारणा का रहस्य?
उत्तर प्रवेश होगा - रेंगता हुआ,
एक सफ़ेद तिलिस्मी जहाज़,
निर्धारित - मेरी दूरस्थ भूमि कि,
बढती महत्वकान्षाओं के लिए|
परन्तु हे भविष्य! सुदूर पे -
आगमन के पश्चात्,
क्या मेरा मन विचीलित होगा?
क्या फिर से यह हवा, यह 
बादल,
मुझे बना पाएंगे रूपक -
अपनी मूर्तिकला का?
स्वागतम के मधुर सुर की भोगी -  
अपनी भूमि, अपने देशज में,
बन पाऊँगी मैं - अपरिचित?


















Sunday, April 15, 2012

एकीकरण


रात की - 
कन्जन्क्टीवाईटिस सी आँखों में,
मेरी कल्पना,                         
मेरे सपनो की गोधूली के बीच,
नज़र आती वह अदृश्य- मृगतृष्णा भूमि

तर्क-वर्णन करती,
मुझसे चंचल मैं,
"सत्य क्या है?

"यह जगह -
"जहाँ हम रहते हैं?",
यह गुम्बज - 
जैसे जीवन के ग्लोब पर स्थिर -
लघु कथा,

अंततः फिर प्रवेश होता,
मेरे जीवन प्रतिक पर,

रात और दिन का एकीकरण ।


Monday, April 9, 2012

प्रेम छवि - दीवार के अन्य पक्ष से !






मैं आऊँगी वापस,
जल्द ही,
मेरे प्रिय!                                
और मैं लाऊँगी तुम्हारे लिए,
वो फूल जो मैंने चुने हैं,
तुमहारे लिए,
दीवार की दूसरी तरफ से -
वो अन्य पक्ष -
दिवार के!
और फिर तबाह हो जायेंगे,
सभी बंद फाटक,
प्रेम से!
तब चलेंगे हम दोनों
उन निर्जन द्वीपों पर -
प्रेम युद्ध के साक्षी,
जयजयकार करते उन लोगों की -
संवेदनशील लोग-
धार्मिक द्वारा प्रेम,
प्रेरित हम,
मंत्रमुग्ध -
प्रेम से !



(चित्र: लवर्स डिस्कोर्स - रोलैंड बार्थस)

Saturday, April 7, 2012

पलों की तुकबंदी


गीले तिनकों से फिसल जाते हैं पल              

जो तेरे साथ में गुज़रते हैं,

पल नहीं ये ओस की बूँदें हैं

जो ख्वाबों की तितलियों के परों पे सवार

तुम्हारे आशियाने की नमी बन जायेंगे|


पल जो उतारे थे तेरी गर्दन से,

पल जो कहीं पीठ पे गुम हो बैठे हैं,

पल जो गुम्साज थे लकीरों में,

पल जो आवाज़ तक खो बैठे|


वो विषाद की लकीरें जो अटकती

मेरी आँखों में किरकिरी बनके,

कि भटकती राह दिखा दो उन पलों को

जानती हूँ पल और इंतज़ार इश्क का विस्तार है

कोई ऐसा राग सुनाओ जिसका इंतज़ार ये पल करें|