Saturday, April 7, 2012

पलों की तुकबंदी


गीले तिनकों से फिसल जाते हैं पल              

जो तेरे साथ में गुज़रते हैं,

पल नहीं ये ओस की बूँदें हैं

जो ख्वाबों की तितलियों के परों पे सवार

तुम्हारे आशियाने की नमी बन जायेंगे|


पल जो उतारे थे तेरी गर्दन से,

पल जो कहीं पीठ पे गुम हो बैठे हैं,

पल जो गुम्साज थे लकीरों में,

पल जो आवाज़ तक खो बैठे|


वो विषाद की लकीरें जो अटकती

मेरी आँखों में किरकिरी बनके,

कि भटकती राह दिखा दो उन पलों को

जानती हूँ पल और इंतज़ार इश्क का विस्तार है

कोई ऐसा राग सुनाओ जिसका इंतज़ार ये पल करें|

Thursday, April 5, 2012

सावन् का इन्तज़ार्


                                 
आज फिर चली दिस्मबर के महीने की हवा सर्द,

लबों पर हंसी आँखों में नमी देता



तेरी  नामौजूदगी  का दर्द

दिल का पंछी आज फिर है उङने को बेकरार

ये धङकने फिर भी करती हैं "सावन का इंत्ज़ार"


वो तेरी साँसों की गर्मि का



मखमला सा एहसास,

आम सी थी मैं पहेलि



 तुने बनाया था कुछ खास,

शीशे से रुबरू हो के करती अब



अपनी तमन्न‌ओं का इज़हार

मेरी परछा‌ई फिर भी करती "सावन का इंत्ज़ार"


तेरी जुस्तजु में खो जाने को 



ऊंघता ऊमङता है मन

तेरे इश्क बिना अधूरा सा लगे यह जीवन,

आँखें आज भी तेरे नाम से करतीं 



सहरी और इफ्तियार

पर मुझे फिर भी है "सावन का इन्तज़ार"

Tuesday, April 3, 2012

मेरा सपना

आदरणीय माता - पिता

यह बात परम्परागत रूप से सत्य हो सकती है कि मेरा सपना मुझे समाज के नियमों के अनुसार एक अच्छी और लायक बेटी घोषित नहीं करता | समाज के रचनकारों के अनुसार जीवन व्यतीत करना मेरे लिए मूर्छित अवस्था में होने जैसा है और इस बात कि स्वीकृति मेरी आत्मा नहीं देती मुझे|

आपका यह समाज , यह दोगुना मानक वाला समाज मेरे सपनों से मेरे संबंध को समझने में असफल है और मुझे इस समाज को अपने ढांचे में ढालने में कोई दिलचस्पी नहीं | मेरी इस पीड़ा को समझने में आप भी आज असमर्थ रहे हैं क्यूँकी आप भी इस समाज के आदर्शों पे चलने वाले पुतले हैं| आज मैं ऐसी कशमकश में हूँ जहाँ आपका प्यार मेरे सपनों के बीच रुकावट बनके खड़ा है |

मैं इस प्यार के बिना तो शायद जिंदा रह लूँ परंतु अपने सपने का दाह संस्कार करना मेरे लिए संभव नहीं|अकेले रह कर संसार के ठहाके सहना शायद आसान हो मेरे लिए पर अपने सपनों को त्याग कर अपने अंतर्मन्न के ठहाकों का शोर मुझे तिल-तिल करके मार देगा |

आपकी बेटी


बस यूँ ही अंतर्मन से...



मेरी कल्पना जीत जाती है - कभी कभी  
प्राकृतिक वास्तविकताओं से,
यह धोखा सहने योग्य था,
असहनीय दर्द शुरू हुआ जब - मुस्कान से वंचित,
अवसर प्रवेश करने गया था,
मैदान में- ख्वाबों के |


Friday, March 30, 2012

हे राजधानी !




हे राजधानी !

तेरी छावनी में,
                                               
तेरे अस्तित्व से बचके,

निकलते हैं जीव चरने को,

अकेलेपन के तिनके,

और छोड़ जाते,

सूखी आत्मा और भीगे हाथ|


हे राजधानी !

न कर गुरूर इतना,

रह जायेंगे मूल तेरी चौखट पे,

कुछ पंछी अटल,

अपने पंखों पे लिए,

सरकती दुआएँ...




(चित्र: धीरज चौधुरी)

Wednesday, March 28, 2012

अकेलापन (आत्म अवलोकन) - 36 Chowranghee Lane देखने के पश्चात्


कभी कभी ऐसा लगता है कि मैं पागल हूँ जो मानव झुंड में उड़ान भरने कि कल्पना करती हूँ| परंतु जितनी बार भी मैंने सांसारिक वास्तविकताओं से बचने कि कोशिश कि जीवन के अनोखे पन ने उसी पल मुझे किसी वैक्यूम क्लीनर कि तरह अपनी और खींच लिया| अफ़सोस यह है कि जीवन हमारी चाहत के अनुसार स्वयं को त्यागने नहीं देता| ऐसा अक्सर मुझे लगता है कि संसार की सभी बुराइयाँ इकत्रित होके कुछ जादू टोना सा कर रही हैं मुझ पे और इस जादू टोने के प्रभाव से मेरी रचनात्मक भावना स्वयं को निहत्था और बेबस महसूस करती हैं | ऐसा नहीं है कि अकेले लड़ना मुझे आता नहीं परंतु अकेलापन मुझे बर्दाश्त नहीं होता और प्रभु पे सब छोड़ देने से कोई लाभ होता तो बुद्धिजीवी ये नहीं कहते कि "इन्सान ही इन्सान के काम आता है" |

कई बार युवा अवस्था में खुद को मनोचिकित्सक एवं साधुओं-फकीरों से भी दिखवाया कि मैं अपने भीतर के संसार और बाहर के संसार में समझ और संतुलन क्यूँ नहीं बिठा पा रही| सब ने खूब दवाइयां, पत्थर और मालायें दीं मुझे पहनने को परंतु मुझे यह नहीं समझा सके कि मेरे जीवन के अर्थ का विश्लेषण करने का तरीका बिल्कुल अलग क्यूँ है| वो यह नहीं समझा पाए मुझे कि क्यूँ मुझे नीरसता और उदासीनता में सुकून मिलता है| शायद वो नहीं जानते थे कि अपने सपने का तकिया बनाके उसपे सोना और अगले दिन सूर्य कि पहली किरण के साथ उस सपने को पूरा करने कि आशा को लेकर घंटो सोचते रहना क्या होता है| अगर इच्छाएं घोड़े पे सवार होती तो इस मुखौटा पहने संसार कि हर बात का विश्वास हो जाता पर सत्य हमारी सोच से बहुत गूढ़ है और ऐसी कल्पना से साहस कि उम्मीद रखना व्यर्थ ही रहेगा| शायद रबिन्द्रनाथ टैगोर ठीक कहते हैं, "एकला चलो रे"...

Friday, March 23, 2012

जीवन संगिनी

दिवार की शुन्यता पे टंगी,
खुरचन सी टपकती,
उसकी हंसी,
मेरी आँखों की पुतलियों की चमक |


झूर्रियों वाले चित्र की अमूर्तता,
सीने पे स्थाई गुम्बज,
वो काल का अंतिम छल-कपट,
और प्रवेश द्वार पे खड़ी,
वो मेरी जीवन संगिनी |

Thursday, March 22, 2012

ओ मेरे बचपन!

ओ मेरे बचपन!
तुम्हारे जाने के बाद,
ओ मेरे बचपन!
वह खिड़की, वह बंधन,
पक्षियों और मेरा,
ठोस, ज्वलंत बंधन,
भाजित,टूटा,विभाजित...


ओ मेरे बचपन!
तुम्हारे जाने के बाद,
ओ मेरे बचपन!
मूक और शुष्क,

मिट्टी सी गुड़िया,
आँखों में किरकिरी,
और डूबता पानी,
और डूबती मैं...

Tuesday, March 20, 2012

राख से निकलता पेड़




मैं बन रही थी राख,
वास्तव में,
आग की लपटें,
मुझे घेरे हुए थीं|
मैं बुरी थी,
दुष्ट नहीं थी,
शायद लाचार,
सारी दुनिया जुट गयी,
मुझे शाप देने में|
फिर तुम मिले,
शब्द बनके आत्मा से,
और मेरी देह में,
कविता सी बहने लगी|
मैंने पूछा,
"मिलोगे अगले बसंत?",
तुम मुस्कुराए,
और मैं खिला हुआ पेड़ बन गयी|

Monday, March 19, 2012

नींद - मुझसे रूठ गयी है

कह दो बाबुल से,
मखमल के बिस्तर पर,
नींद करवट लेते हुए,
भौचक्की हो कर  ताकती,
कमरे के सफ़ेद उजाड़ रंगों को|


मेरी नींद सूने वृक्ष के
घोसलें में फँसी चिड़िया,
इंतज़ार में तड़पती
की कब दीवारें - बूँद बूँद,
रंगीन पपड़ियाँ गिरा दें,
और मैं सो जाऊँ,
सपनों की बसंत में ।

Sunday, March 18, 2012

रात का आवरण संगम




कोहरे में कंपकपाती रात,
एकांत में दस्तक देती,
स्वयं को खोजती आई,
मेरे दरवाज़े पर सिमटी हुई -

क्लांत भावनाओं से |

श्रृंगार से सुशोभित काली स्त्री,

अपने स्याहपन  के इकहरे आवरण में,
फिर सींचती मेरे शब्दों को,
चाँद पर बिखरी गोधूलि से
और खुरचती प्रत्यय पर फैले ज़हर को|


शायद अपने जैसी वंचित,
मुझे व्यर्थ समझती हुई आई,
ले जाने तारों की छावनी में,
जहाँ इश्वर तैरते हैं,
नींद और स्वप्न की नगरी के संगम पर|

Friday, March 16, 2012

मैं सिर्फ मैं हूँ (चित्र : साल्वाडोर डाली)





मैं सिर्फ 'मैं' हूँ,कोई और क्यूँ नहीं? 
कोशिश करके बन जाती हूँ,
लेकिन उससे क्या होगा?
मेरे दिल के ख़ामोश लम्हे - 
मेरे जीवन में 'मैं' के उद्देश्य का,
रद्दी भर भी एहसास कर पाएंगे?

मैं सिर्फ पहचान सकती हूँ -
स्वयं की सीमाओं को,
किसी और रूप में ढल भी जाऊँ,
परंतु कैसे भावनाएं समझेंगी - 
मेरे अस्तित्व में छुपी,
मान्यता देती 'मैं' की असुरक्षा को ?




मैं, लेती एक निर्णय - 'मैं' नहीं रहती,
फिर देना इस छद्दा रूप को
मेरे व्यक्तित्व के सत्य का परिचय,
अगर मैं हो जाये दफ़न - 
इस गलत पहचान के मलबे में,
फिर से क्या मैं की आत्मा - 
अपनी परिकल्पना खोज पायेगी?

Monday, March 12, 2012

प्रेम प्रेम प्रेम

खड़ी हूँ मैं,
चुप्पी को थामे,
नंगी आत्मा के साथ,
शब्दों की निविदा के बीच,
परखती अपने घाव,
जो चीखते,चिल्लाते,
प्रेम,प्रेम,प्रेम...

पर्वत अकेले हैं

पर्वत अकेले हैं,
लेकिन बंधे,
एकजुट जंज़ीरों से,

हम इंसानों की तरह -
इस भीड़ में एकत्र,
और हर चेहरे पर झलकता -
अकेलापन |

Friday, March 9, 2012

नीचे खड़ी एक स्त्री

एक दिन भोर होते ही अपने कमरे की खिड़की से बाहर झांक के देखा तो नीचे खड़ी एक स्त्री की आकृति नज़र आई| वो कुछ हाथों के इशारे करती जा रही थी, धूप के कारण वो सब मुझे अलग-अलग आकृतियाँ नज़र आईं| फिर कुछ समय बाद जब रात के सपनों की किरकिरी पानी की छपकियों से साफ़ कर दोबारा उस स्त्री को देखना चाहा, तो हैरानी की बात यह नज़र आई की वो स्त्री मैं ही थी| हुआ यह था की मेरी आत्मा नीचे खड़ी हुई मेरे शरीर को आवाज़ लगा रही थी कि दोस्त नीचे आ जाओ, पैर ज़मीन पे रहेंगे तब ही भ्रम को सत्य बनाने की हिम्मत आएगी|फिर मैं उल्हास और उत्सुकता से भरी तुरंत नीचे जा पहुँची और देखा की उस जगह पर मेरी आत्मा नहीं, एक गाड़ी खड़ी थी और उसके बोनट पे नज़र आई मेरी छवि |


Saturday, March 3, 2012

मैं हूँ तुम्हारी आत्मा




मैं एक आत्मा, एक नन्हा सितारा,
तुम्हारी भौंहों के बीच अपने सिंहासन पर बैठी हूँ |
वहाँ से मैं अपने गंतव्य को स्पष्ट देखती हूँ,
सुनहरे लाल प्रकाश से आगे, विचारों के पंख लगाये उड़ती मैं |


मैं आत्मा आनंद के महासागर से उर्जा की खोज करती,
सभी दिशाओं से आती अध्यात्मिक धाराओं के,
सर्वोच्च स्तर पे खड़ी अपने भीतर को,
आनंद के प्रकाश से स्पंज की तरह भिगो रही हूँ |


मैं तुम्हारी इन्द्रियों के संग बह निकली हूँ भावों में,
सब में एक कामुक संबंध बनाते हुए|
तुम्हारे जीवन का असली उद्देश्य समझती,
अपनी रूचि का प्रतीक देती, मैं हूँ तुम्हारी आत्मा |








Wednesday, February 29, 2012

शब्द ही सम्पूर्ण है


क्या है जो हमें मनुष्य के रूप में परिभाषित करता है?विख्यात थाई लेखक और राजनियक Luang Wichit Wathakan के अनुसार इसका उत्तर है "जीवन भर संघर्ष करने की हमारी प्रवृति"| परन्तु इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है अपनी शख्सियत को एक धारा में शब्दों में परिवर्तित कर पाने का वरदान|शब्द हमारे जीवन की सम्पूर्ण व्याख्या है, इस बात का विचार किये बिना कि उस क्षण हम किस स्तिथि में है,मूर्त या अमूर्त|संक्षिप्त में कहा जाये तो जीवन का एक अर्थ शब्दकोष है,जिसमें भाव और क्रिया अक्षर का कार्य करते हैं| किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थान कि व्याख्या बिना शब्दों के महत्वहीन और निरर्थक बन जाती है, जिसके कारण जीवन समुर्छित (state of coma) होने का अनुभव करता है|


रिश्तों में शब्दहीन अवस्था, काले साये की उदारता में ढले हुए शमशान में पड़े कंकाल की तरह है| एक नीरस सूखापन उन दो या उससे ज्यादा व्यक्तियों के बीच नज़र आता है जहाँ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं होता| शब्द किसी भी रिश्ते में वरदान और अभिशाप दोनों का काम करते हैं, परन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि रूप कुछ भी हो, शब्द ही रिश्तों को उनका अस्तित्व देने वाली कड़ी है| एक उदहारण हम German निर्देशक Fassbinder की फिल्म 'Chinese Roulette' में देखते हैं, जहाँ Angela और उसके माता-पिता के बीच शब्दों की कमी होने की वजह से उनके रिश्ते में वैध कुछ भी नहीं रह जाता| 'Chinese Roulette ' के खेल का तत्व भी शब्द ही है, जिसे बातचीत से वंचित Angela फिल्म के सभी पात्रों का विवरण करने में इस्तमाल करती है|अर्थात शब्द ही सत्य है, जो हर व्यक्ति का समस्त,शुरुआत और अंत है|

Monday, February 27, 2012

धूल हूँ मैं





तुम्हारे कमरे के कोने में चिपकी धूल हूँ मैं,
जिसे तुम्हारे पैर जाने-अनजाने मुसाफिर बना लेते हैं|
लौटने पे तुम्हारी भीगी सी टी-शर्ट की चिपचिपाहट बन,
कई दिनों तक तुम्हारी खुशबू का एहसास करती रहती हूँ|


कभी किसी हवा के झोंके का साथ रहा,
तो मैं धूल तुम्हारे बिस्तर पे जमघट बना लेती हूँ|
इंतज़ार करती की कब तुम नींद में खो,
और मैं चुम्बन बनके तुम्हारे गालों पे चिपक जाऊं|

मैं धूल तुम्हारे नाखुनों में धीट जैसी जमी रहती हूँ,
की जब तुम पहला निवाला लो तो मैं चुपके से,
तुम्हारे शरीर का सफ़र तय करती हुई,
बिना किसी आहट के तुम्हारे दिल में स्थायी हो जाऊं...



Friday, February 24, 2012

विदेशों में भारतीय





मेरे चौबारे से उड़ती गोधूलि -
दुनिया के नक़्शे पे तितर - बितर ,
रंगीन बिन्दुओं से पूछ,
आम की कैरियों की सोंधी खुशबू,
क्या मुझ जैसी कद-काठी  वालों को लुभाती है?

मेरे छज्जे पर वक्त-बेवक्त फिरते पक्षियों - 
मेरी नींद जैसी असंतुलित धुन में,
शायद मखमल के बिस्तर पर,
पड़े उन छोटे लोगों से पूछ,
कैसी है मिठास वहां लोरियों की? 

मेरे लहराते खेतों से चुने हुए दाने -
वहां मेरे रंग में ढले,
दिल के करीब किसी अजनबी से पूछ,
क्या वहां के चूल्हे पर सिकती रोटी से,
टपकती वो ही पुरानी उसकी लार?

Tuesday, February 21, 2012

आकर्षण की मृगतृष्णा...


जीवन में जो हम स्पष्ट आँखों से देख सकते हैं, वो ही सत्य नहीं होता, अधिकतर नज़ारे मस्तिष्क दवारा उत्पन्न किये गए मृगतृष्णा होते हैं, जिनके लोभ में इन्सान भावात्मक हो उठता है|हमारी पाँच इन्द्रियाँ मोहित हो कर एक ऐसी मनोकामना को जन्म देती हैं जो सच्चाई से अलग, अकल्पनीय पूर्ति की दिशा में सभी करनी व कथनी को मोड़ देती है|किसी घुड़सवार जैसे यह मनोकामना मनुष्य के विचारों से उत्पन उर्जा युक्ति को काबू कर, मायावी रूप से सुशोभित कर देती है|

"सब चमकती हुई चीज़ें सोना नहीं होती", परन्तु फिर भी हम इस चमक के लोभ में निहत्थे और बेबस हो कर बंदी  बन जाते हैं, और एक खिचाव सा भावनाओं पे महसूस होता है, सत्य और भ्रम को न परख पाने की विवशता ही शायद इन्सान को कितनी बार निष्क्रिय स्तिथि में डाल देती है|ऐसी अवस्था में एक अयोग्य इन्सान, अपनी दूषित प्रज्ञा से प्रभावित, स्वयं के ज़मीर से विपरीत कार्य को ही सत्य और अनुशासित बताने के अलग अलग तर्क बनाता है |इसी नकारत्मकता से उत्पन धुंए से इन्सान भ्रमित होकर,मुखौटा पहन अपने ही अस्तित्व की तलाश सम्पूर्ण जीवन करता रहता है|