Tuesday, September 13, 2011

प्लेटफ़ॉर्म






भोर होते ही मुसाफिरों के लिए बाहें खोल देता वो
कभी गन्दा कभी साफ़ रहकर भावों को गुनगुनाता वो
ट्रेन की गति से धड़कता उसका दिल, ध धक् ध धक्
इश्क में हाथ थामे प्रेमी कहते, ' समय थोड़ा और रुक '
कॉलेज बुक्स, ऑफिस ब्रिएफ़्केस हर कोई उठाता बोझ
मुस्कुराते हुए कहता खुद से क्यूँ आते हम यहाँ रोज़?
गुज़री रात के किस्से कहानियां गुम हो जाते इसकी धूल में
कुछ मुलायम कुछ खुरदुरे सपने छुपे इसके सीने में
राही को देता दिनभर की भागम भाग के लिए हिम्मत
सजती पल- पल यहाँ थोड़ी काली थोड़ी सफ़ेद किस्मत
काश बोल सकता, तो बयान करता यह लोगों के मनसूबे
जान जाते हम शायद कहाँ ज्योत जली, कहाँ दिये बुझे ...

Wednesday, August 3, 2011

"जूठन"



मायूस ,बेबस चुपचाप खड़े हुए,
ललचाई नज़रों से ख़ाली करता वो,
वाइट कॉलर वालों का जूठन,
मजबूरी उसकी 4000 प्रति महीने की आमदनी
फिर वही सोच क्या आज घर में रोटी बनी ?




प्लेट में पड़ा वो पुलाव, आधी मिठाई,
दो वक़्त की रोटी के लिए लड़ाई,
ललचाई नज़रों से खाली करता वो,
वाइट कॉलर वालों का 'जूठन ',
और नाउम्मीदी  के संग सफ़र तय करता राही ।




पहला निवाला लेते ही,मुंह सिकोड़ के,
लोगों का कहना "यार बेकार खाना है",
यह देख अपनी क़िस्मत से नाराज़,फुन्फुनाते हुए,
ललचाई नज़रों से खाली करता वो,
वाइट कॉलर वालों का 'जूठन ' ।












Tuesday, July 26, 2011

" इलेक्ट्रिक चूल्हा "






कुछ गिने चुने स्टील के बर्तन,
ज़रूरत के हिसाब से मसाले,
बस इतना ही था उस भावनाहीन कमरे में
उस दिन जैसे गृहिणी की रसोई बन गया था
वो कोने में पड़ा 'इलेक्ट्रिक चूल्हा' |



वो 2/2 की जगह अन्नपूर्णा  का स्वागत करने लगी,
कुटुंब की दास्तान सुनाती जैसे दाल-सब्ज़ी,
कई दिनों से वो साधारण रूप वाला, 
ज़ंग खाता हुआ - जलने पर,
 हमारे प्यार जैसे जगमगा उठा ' इलेक्ट्रिक चूल्हा ' |



तुम्हारा मेरे हाथ से निवाले को लपक कर खाना,
4-5 वर्ष के बालक जैसे  टुक - टुकी  लगाये 
थाली में पड़े दाल भात को ताकना,
हमारे इसी प्यार की मासूमियत को देख,
गर्व और ख़ुशी से झूम उठा वो ' इलेक्ट्रिक चूल्हा ' |








Tuesday, July 19, 2011

"तेरी - मेरी ज़िन्दगी"


तेरा ज़िन्दगी में आना जैसे ओस की ताज़गी हो,
तेरी बातें जैसे झींगुरों की मौशिकी हो,
तेरी हंसी से जगमगाती तारों की छावनी में रात हो,
तेरा एहसास जैसे सूनेपन का मलहम हो,
तेरी बाहों में रहना जैसे मेरी इबादत हो,
तेरा इश्क काँटों पे चलने की राहत हो,
तेरे होटों को चूमना जैसे जाम का प्याला हो,
तेरा मुझ में सामना जैसे पतझड़ के बाद सावन हो,
तेरी आँखें मेरी सादगी का आइना हो,
तेरी मौजूदगी मेरी धड़कनों की ज़िन्दगी हो,
तेरी रूह से गुफ्तगू जैसे मेरी रूह का जूनून हो,
तेरी ख़ामोशी, तेरी नाराज़गी जैसे मौत का पैगाम हो |

Thursday, July 14, 2011

ख्वाब - बस यूँ ही !


मेरे दिल में ख़्वाब तो बहुत हैं,
मगर बयान करने को शब्द नहीं
बस देख ले एक नज़र आकाश में बादलों को -
कुछ काले कुछ सफ़ेद बदल,
बस ऐसे ही गहरे हल्के हैं मेरे ख़्वाब |



इन ख़्वाबों में कई बातें सोची हैं,
पर सब बातों की वजह नहीं जानती
बस देख ले दूर समुन्दर में - 
पानी के अनेक रंगों को,
बस ऐसे बदलते से रहें मेरे ख्वाब |



आर्ज़ुओं में ख्वाब या ख्वाबों में आर्ज़ू ,
नहीं जानती किसकी महिमा श्रेष्ठ है,
बस देख तेज़ बहती हवा को -
कभी इस छोर, कभी उस छोर,
बस यूँ ही मचलते से हैं मेरे ख्वाब ।


Saturday, July 9, 2011

मेक--अप


लैक्मे के काउंटर पे जाना उसने छोड़ दिया था
क्यूंकि अब उसके "होठों का मधु" ही उसकी लिपस्टिक था
वो चेहरे के दाग छुपाना,फेस पावडर या कॉम्पैक इस्तेमाल करना ,
उसके "हाथों के स्पर्श" के आगे फीका लगने लगा |
ऑफिस से आके वो सिर्फ पानी से निकली
उसकी पसीने की खुशबू से महकती टीशर्ट पहन लेती|
वो जिसे पर्सनल हाइजीन का बुखार था
उस "घिन'' को भी अपने प्रेमी का एहसास समझने लगी |
वो बेडरूम का फुल लेंथ आईना कई बार उसके चहेरे की
सुन्दरता का वर्णन कर चूका था ,
पर उसकी खूबसूरती और सादगी का आईना सिर्फ उसके "प्रेमी की आँखे" थी |
बस एक नया गहरा काला  काज़ल उसके मेक-अप  किट की एक मात्र ज़रूरी वस्तु था |
वो उसकी ज़िन्दगी में रौशनी काज़ल से भी गहरी कलि रात में लेके आया था,
उस दिन से वह उस लम्हे को अपनी आँखों में काज़ल लगा के "कैप्चर" करने लगी|

Thursday, May 5, 2011

॥ मौसम के झरोखे ॥


वो बरसात कि पहली बूंद का होठों को छूना,
वो सावन की हवा में लहराती ज़ुल्फें,
 तेरे स्पर्श के एह्सास को उमड़ती हसरतें,
मौसम के झरोखे की लुका - छुपी का क्या है बहाना|




वो ठंड में तेरी सांसों की गरमाहट,
होठों की कम्पन से भी निकले तेरा नाम,
हर दस्तक पर लगे जैसे हो तेरी आहट,
मौसम के झरोखे क्युँ हैं गुमनाम|




वो तेरी हंसी की शादाब की महफिल,
तेरे इश्क़ में, नाउम्मीदी में दिखे उम्मीद,
ये दुआ ये जुनून कि पा  लूंगी  तुम्हें,
मौसम के झरोखे की कहाँ गई प्रीत।




Saturday, April 30, 2011

इश्क अव्यय




क्या  सुनाऊँ  तुझे  मैं  दास्तान-ए-ज़िन्दगी ?
वो तिनके  तिनके  सी  अधूरी  मेरी  मुस्कान
न  बना  दे  कहीं  तुझे  काफ़िर  मेरी  दर्द-ए-मौशिकी
क्या  शिकवा  करूँ  दिल  से  जो  तुझे  जान  के  भी  कह  रहा  अनजान ?
क्या समझ  पायेगा  तू  मेरी  अनकही  इबादत  से  वफ़ा ?
गुमशुदा  कर  देगा  तुझे  मेरी  तनहाइयों  का  सैलाब
तुझसे  रूबरू  न  जाने  क्यूँ  लगे  जैसे  जन्नत-ए-खुदा
क्या  तेरी  रूह  मेरी  रूह  से  गुफ्तगू  करने  को  है बेताब ?
क्या देख  सकता  है  तू  मेरी  आँखों  में  वो  बेबसी ?
दूरियों  के  बावजूद भी मैं  रहूँ  सिर्फ  तेरा  ही  साया
तेरा   उन्स तेरे  एहसास  की  तड़प  जैसे  कोई  कातिल-ए-मदहोशी
क्या  तेरा  इश्क  है  वक़्त  का  मोहताज  या  है  ख़ामोशी  तक   अव्यय ? 

Friday, December 31, 2010

मैँ बावरी, मस्त् मौला




मैँ बावरी, मस्त मौला
कभी खाली, कभी भरा मेरी ज़िन्दगी का झोला
मदहोशी नहीं, होश में भी मेरा दिल डोला
मैँ बावरी, मस्त मौला

ग़म में मैँ नाचूँ हो कर मगन 
ख़ुशी  में हंसता मेरे संग गगन
मुझसे  ही मेरा मन बोला
मैँ बावरी, मस्त मौला

चाहे हो नादान बचपन या ज़िद्दी जवानी
हर दिन ज़िन्दगी का, एक न‌ई कहानी
हंसते हु‌ए  पीना ज़िन्दगी का खट्टा-मीठा प्याला
मैं बावरी, मस्त मौला
मैं बावरी मस्त मौला




Friday, December 24, 2010

"तेरी मेरी बातें"


तेरी मेरी बातें
वो कही अनकही बातें
दिल की आरजू का धङकता हु‌आ आगाज़
तुझसे न को‌इ शिकवा, न हु‌आ तुझे को‌ई एह्सास
न जाने क्यूँ  रूठता सा फिर मेरी तमन्ना‌ओं का बाज़ार
वो तेरी मेरी बातें

तेरी मेरी बातें
वो खुशी या गम की मुलाकातें
ज़िन्दगी की दूर थी मंज़िल
कुछ कदम चले तुम, कुछ हम
कहा था तुमने, बस ऐसे ही देना साथ
फ़िर चाहे हो खुशी या गम की महफ़िल
वो तेरी मेरी बातें

तेरी मेरी बातें
एक साथ बिताये वो दिन, वो रातें
अब तेरे इश्क के मझदार की करूँ इबादत
ये है ऊन्स या सुरूर या है कयामत
मेरे मालिक ने की दु‌आ कुबूल मेरी
तुझसे पहले दी मेरे जनाज़े को इज्जाज़त
वो तेरी मेरी बातें..वो तेरी मेरी बातें

Thursday, December 23, 2010

हम तुम एक दिल, एक जान




हम- तुम एक दिल, एक जान
रिमझिम रुनझुन बारिश  की बूँदें
हम-तुम एक दिल, एक जान
इस मौसम में सुलगते रहें

क्या सुहानी है यह हवा
जैसे वक्त न था और जवान
कुछ भीगता सा तन तेरा, कुछ मेरा
इन आँखों में रहे तेरे इश्क का बसेरा

हम- तुम एक दिल, एक जान
ऐ मेरे जाने जहान, हम तुम एक दिल, एक जान

न को‌ई लफ्ज़. न को‌ई बात हो
ऐ जाने जहान बस यूँही  मुलाकात हो
हम-तुम एक दिल, एक जान
तेरे रुबरू से धङकता यह दिल
बस आज इस खामोश  मोशिकी में इश्क कयामत हो

हम- तुम एक दिल, एक जान
ऐ मेरे जाने जहान
हम- तुम एक दिल, एक जान

Wednesday, December 22, 2010

नारी


कभी ममता का दुलार, कभी नन्ही सी किलकारी
कभी बहना की प्यारी राखी, कभी संगीनी की ओढ़नी प्यारी
बागबान ने खिलाई थी वो नन्ही सी फुल्कारी
कली से जब बनी फूल वो,आ गई ले जाने भंवरों की सवारी
कहाँ छुपती वो, हर जगह थी बेरहम दुनियादारी
वो माटी की बन्नो सुलगती रही धूप में सारी
सरस्वती की विद्या , कभी लक्ष्मी बन सिक्कों की झंकारी
यही सोच लोग बनाते रहे बार बार उस पर अत्याचारी
नही जाना यही महीषासुर वध वाली दुर्गा सिंह पर सवांरी
माटी की बन्नों सुलग सुलग के रूप ले बैठी न्यारी
हुआ मनुष्य बेचैंन और औरत की आरती उतारी
दुनिया सोचती बस छह मीटर कपङे मे रहे उम्र सारी
ना जाने लोग यही सौम्यरूप से रुद्र्रूप ले लेती हे नारी
ना फुलकारी ना माटी बस हर युग,क्षेत्र में इसने बाज़ी मारी
आओ खुशी मनाऎं गर्व करें की हम हैं नारी, हम हैं नारी...